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विवाह के प्राकृतिक अर्थ में ज्योतिष और पारिवारिक दायरा!

  • विवाह का प्राकृतिक समय, विवाह का अर्थ का अज्ञान।
  • विवाह के रिश्ते को स्थूल गुण मिलान से कायम करना।
  • विवाह के सुखों को नष्ट करने वाले योगांे का अज्ञान।
  • जुड़वाँ (परछाई योग) का सिद्धान्त न होना।
  • मंगल (प्राकृतिक बहन-भाई) का सिद्धान्त न होना। प्रचलित ज्योतिष में आलोचनात्मक आधार नं0-17.

विवाह के प्राकृतिक अर्थ व समय का पूर्ण रूप से अज्ञान:

तत्व ज्ञान के अभाव में आज प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में शास्त्र का वास्तविक स्वरूप कहीं भी दिखाई नहीं देता है। विवाह को मुख्य रूप से वंश उत्पत्ति का साधन माना जाने लगा है। इस विषय में हर एक की अपनी अनुभव के आधार पर अलग मान्यता है। ज्योतिष शास्त्र में इसकी स्पष्टता दिखाई देती है।

तत्वों के आधार पर इसकी मान्यता भिन्न जरूर होती है। सिद्धान्त के तहत सप्तम भाव से आगे के भाव (अष्ठम् से द्वारा) इस भाव से मिलने वाले असर पर निर्भर करते हैं। प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में केवल इसे सप्तम् भाव से देखा जाता है। कुछ एक इसे लग्न से भी देखते हैं। दोनों स्थिती में किसी प्रकार का कोई सिद्धान्त कार्य नहीं करता है।

विवाह का वास्तविक अर्थ किसी एक लिंग का सम्पूर्णता को प्राप्त करना होता है। सम्पूर्णता योग लग्न से देह के सुख के लिए बनता है। एक सम्पूर्णता का योग हृदय के सुख के लिए बनता है। एक सम्पूर्णता का योग लिंग के सुख के लिए बनता है। सम्पूर्ण प्रचलित ज्योतिष इस बात से अन्जान है।

विवाह के समय में सभी तुके मारते दिखाई देते हैं। फलित के लिए इस ग्रह की महादशा में इसका अन्तर आने पर होगा, नहीं होने पर अब इसमें इसका अन्तर आने पर होगा। बस इसी प्रकार की बातें सामने आती है। अब कि बार इसका प्रभाव नहीं मिला अब की बार इसका प्रभाव नहीं आया। किसी के पास कोई सिद्धान्त नहीं है। सिद्धान्त की कमी के कारण सब कुछ गलत होता है।

बीमारी मिलने के साल यदि विवाह संस्कार हो गया तो फिर सारा जीवन बीमारी की भाँति जाता है। मुत्यु के साल संस्कार हो गया तो मुत्यु तुल्य कष्ट का प्राप्त होना निश्चित हो जाता है। शत्रु मिलने के साल में संस्कार होता है तो सारा जीवन शत्रुता में व्यतित हो जाता है। भाई मिलने के साल संस्कार हो जाते हैं तो सारा जीवन आत्मग्लिानी में चला जाता है। ऐसे में उत्पन्न सन्तान वर्णशंकर कहलाती है। जुडँवा मिलने के साल में संस्कार होने पर सारा जीवन, आयु में श्रेष्ट कष्ट प्राप्त करता है।

किस समय कौन सा रिश्ता मिलना है इसका किसी के पास कोई सिद्धान्त नहीं है। इस एक सिद्धान्त के नहीं होने के कारण विवाह का अर्थ बदल गया है। गलत समय पर विवाह करने के कारण पारिवारिक जीवन एक संघर्ष बनकर रह गया है।

पुरूष के लिए स्त्री बीमारी बन गई है। कुछ के लिए स्त्री केवल देह सुख का साधन बनकर रह गई है। स्त्री के लिए पुरुष चरित्रहीनता का प्रर्याय बनकर रह गया है। समाज से हकीकत गुम हो गई है। विवाह का नाम एक डर बनकर रह गया है। हर किसी को भय बना रहता है विवाह तो करंे ना जाने कैसा जीवन व्यतीत होगा। पूरे समाज में इस डर का कारण प्रचलित ज्योतिष ने उत्पन्न कर रखा है।

समय का उचित ज्ञान नहीं होने के कारण प्रेम विवाह के असफलता का प्रतिशत काफी ऊँचा बना रहता है। समाज के तौर तरीको से किए जाने वाले विवाह संस्कारों की सफलता का प्रतिशत भी नाम मात्र न्यूनतम् बना हुआ है।

जो इस श्रेणी में आते है उनकी मान्यता भी यही है कि समझौता तो करना पड़ता है। समाज की इस समस्या का दोष प्रचलित ज्योतिष शास्त्र को जाता है। विवाह संस्कार के विकृत होने से समाज से चरित्र शब्द का अर्थ समाप्त होता जा रहा है।

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र सिद्धान्तों पर फलित करे तो स्पष्ट रूप से बिना किसी गुना भाग के बता सकता है कि विवाह संस्कार इस साल उचित है या नहीं है। दोनों के सम्बन्धों का खुलासा तत्व लग्न चक्र पर दृष्टि पड़ते स्पष्ट कर देता है।

इसमें केवल एक सिद्धान्त कार्य करता है। सिद्धान्त से विवाह संस्कार को करने के समय को नियुक्त किये जाने से विवाह का अर्थ अपनी प्रकाष्ठा को पुनः प्राप्त कर सकता है। समाज का भावी निर्माण भी तो इस पर निर्भर करता है। उचित समय पर संस्कार किया जाएगा तो निश्चित तौर पर उत्पन्न संन्तान भी बेहतर उत्पन्न होगी। समाज में औसत आयु के कम होने में भी एक कारण गलत समय पर विवाह का संस्कार करना है।

ऐसे महत्वपूर्ण कार्य को गलत समय पर किये जाने के कारण आज समाज में विवाह की परिभाषा बदल दी है। विवाह के साथी की कमी को पूरा करने के लिए समाज में अनेक प्रकार के कष्ट उत्पन्न हो रहे है। समाज में हर कोई इस विषय को लेकर मानसिक रूप से कष्ट में दिखाई देता है। गलत समय पर विवाह के संस्कार होने के कारण मानसिक रूप से या शारारिक रूप से या चारित्रक रूप से विकृत सन्तान उत्पन्न हो रही है। समाज के इस कष्ट का कारण प्रचलित ज्योतिष में कोई सिद्धान्त नहीं होना है।

 प्रचलित ज्योतिष में आलोचनात्मक आधार नं0-18

विवाह के अर्थपूर्ण रिश्ते को स्थूल मिलान पद्धति से कायम करना

प्रचलित ज्योतिष में विवाह जैसे अर्थपूर्ण रिश्ते के मिलान की बेकार की मेहनत बहुत की जाती है। तमाम मेहनत के बाद भी आज हर किसी की मान्यता यही है कि पारिवारिक जीवन एक संघर्ष है। इसमें किसी को सुख नहीं मिलता है। ऐसा नहीं की समाज की यह सोच गलत है क्योकि अनुभव किसी का गलत नहीं होता है। ज्योतिष शास्त्र सिद्धान्तों पर कार्य करने वाला शास्त्र है। अनुभव के आधार पर कार्य करना इसके लिए उचित नहीं हो सकता है। एक सिद्धान्त की कमी के कारण समाज के दोनों लिंग इस विषय को प्रश्न चिन्ह के साथ जी रहे हैं।

समाज का बहुमत विवाह के आनन्द को चन्द दिनों में देखता है। कुछ प्रतिशत तो विवाह के आनन्द से अन्जान पाते हैं। उनके सामने कहा जाए की विवाह में आनन्द प्राप्त होता है तो वह कहने वाले को झूठा मानता है। तर्क के रूप में कहता है की जब मेरे इतने गुण मिलने पर हमारी एक दिन नहीं बन सकी तो अवश्य धोखा हुआ है या इसकी किस्मत बहुत अच्छी है।

विवाह के लिए किसी भी प्राकृतिक रिश्ते को ध्यान में नहीं रखा जाता है। सम्पूर्णता के रिश्ते से प्रचलित ज्योतिष अन्जान है। किसी का भी किसी से मिलान कर दिया जाता है।

प्रचलित ज्योतिष में गुण मिलान पद्धति में कुल आठ प्रकार के कूटों का इस्तेमाल किया जाता है। हर कूट को कुछ अंक प्राप्त होते हैं। वर्ण को 1 अंक, वश्य को 2 अंक, तारा को 3 अंक, योनि को 4 अंक, ग्रह मैत्री को 5 अंक, गण मैत्री को 6 अंक, भकूट को 7 अंक, नाडी को 8 अंक दिये जाते है। इन सबके अंको की कुल संख्या 36 बनती है।

साधारण मान्यता बनाई गई है कि 18 गुणों से कम मिलने पर मिलान को अनुचित करार दे दिया जाता है। गुण 18 से अधिक मिलने पर शुभ माना जाता है। 27 गुणों से अधिक के मिलने पर अत्यन्त शुभ मानते है।

इनके अनुसार इस प्रकार का मिलान करने पर विवाह सफल जाता है। इनकी असफलता का सबसे बड़ा प्रमाण इससे बेहतर ओर क्या हो सकता है कि पारिवारिक जीवन एक समझौता बनकर रह गया है। कोई भी इस बात को कह सकता है कि बिना समझौते के जीवन चल नहीं सकता है। गुण मिलान के बाद भी प्रचलित ज्योतिष में विवाह करने से पहले विवाह के दश दोषों पर भी ध्यान देने की बात कहीं जाती है। मान्यता बनी हुई की कुल 10 दोषों मे से 5 से अधिक दोष होने पर भी विवाह नहीं करना चाहिए।

10 विवाह दोषों में 1 लता, 2 पात, 3 युति, 4 वेध, 5 यामित्र, 6 बाणप्रक, 7 एकार्गल, 8 उपग्रह, 9 क्रान्तिसाम्य, 10 दग्धतिथि ये मुख्य हैं। इनके बाद भी लग्न चक्र की कुछ के बातों का ओर भी ध्यान रख जाता है। इन सब का कोई ठोस परिणाम देने वाला तर्कसंगत आधार नहीं है। इसके साथ कुछ एक लग्न चक्र के योगों की भी बात को ध्यान में रखने का प्रयत्न करते हैं।

उक्त सभी बातों का सिद्धान्त नहीं है। इसमें तत्व की प्राकृतिकता का कोई ध्यान नहीं रखा जाता है। बिना सिद्धान्त के अनुभव कायम रहता है। सबका अनुभव सत्य का स्वाद नहीं दे पाता है। प्राकृतिक रिश्तांे को अनदेखा करने का अर्थ यहाँ स्पष्ट होता है।

समाज चाहे अनचाहे अपने प्राकृतिक रिश्तांे का निर्वाह करने के लिए प्राकृतिक रूप से बाध्य है। प्रचलित ज्योतिष में शास्त्रों में कहीं गई बातों की दुआई तो दी जाती है। शास्त्रांे की बातों को मानने के लिए उनके अर्थ स्पष्ट नहीं होने के कारण उलझन में फँसे रह जाते है।

इसमें विवाह संस्कार के समय ध्यान रखने वाले किसी भी महत्वपूर्ण पहलू को नहीं लिया जाता है। ज्योतिष में केवल एक सिद्धान्त की कमी के कारण विवाह जैसा महत्वपूर्ण कर्म एक बीमारी बनता जा रहा है। विवाह कर्म के प्रति समाज का दृष्टिकोण बदलता जा रहा है। इस कारण का दोष केवल प्रचलित ज्योतिष को जाता है।

समाज का विश्वास इस गुण मिलान पद्धति पर से हट भी गया है। समाज का एक बहुत बड़ा हिस्सा इसकी असफलता के कारण इसका अनुशरण भी नहीं करता है। गुण मिलान का अर्थ क्या है। इस अहम् बात को भी कोई तर्कसंगत आधार पर स्पष्ट नहीं करता है। गुण मिलान में 18 से अधिक को उचित कहा गया है। 27 गुण मिलने को बहुत शुभ माना जाता है लेकिन ऐसे हजारों उदाहरण देश भर में मिल जाएगे जिनके 33 गुण मिलने पर भी जीवन में कष्ट ही कष्ट शेष बचे हैं। पुत्र रूप में सन्तान उत्पन्न नहीं होती आए दिन बीमारी में फँसे रहते हैं।

प्रचलित ज्योतिष में जिस प्रकार एक ग्रह को षडाष्टक जैसे निकृष्ट योगों में विभक्त किया गया है उसी प्रकार गुण मिलान सारणी में भी आपस में शत्रुआंे के गुण ज्यादा संख्या में मिलते हैं। प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में तत्व के मूल आधार पर शुरू में हुई एक गलती आगे के सभी पहलूओ में बराबर मिलती जाती है। प्रचलित ज्योतिष शास्त्र तत्व के मूल आधार पर आज भी ध्यान दे तो उसे स्वयं अपनी गलती का अभास हो सकता है। तत्व से बाहर कहीं किसी का कोई आधार नहीं है। सृष्टि का सबसे बड़ा सत्य तत्व बता सकता है।

तत्व की हर बात किसी ना किसी सिद्धान्त पर कार्य करती है। सिद्धान्त किसी के अनुभव का मोहताज नहीं होता है। सिद्धान्त स्वयं एक सत्य है। ज्योतिष शास्त्र सिद्धान्त की कमी के कारण परिहास का विषय बनता है। ज्योतिष सिद्धान्त पर जब चलता है तभी वह पूर्ण सत्य स्पष्ट करता है। शास्त्रों में कहीं गई एक भी बात सिद्धान्त से बाहर नहीं है। समझनें के लिए सिद्धान्त की आवश्कता पड़ती है। अनुभव आधार पर सिद्धान्त को तोला नहीं जा सकता है।

शास्त्र एक बात सत्य कहता है कि स्त्री के कुवाँरेपन की सभी बीमारियों की एक दवा उसका पति है लेकिन आज सभी बीमारियाँ लगती ही विवाह के बाद है इसका कोई जवाब प्रचलित ज्योतिष के पास नहीं है। प्रचलित ज्योतिष के गुण मिलान में त्रुटी इस बात से स्पष्ट सामने आ जाती है। समाज में पीछले 100 वर्षों में दृष्टि डाले तो स्पष्ट हो जाता है कि तब कितनी बीमारी थी और आज समाज कितनी बीमारियों में फँसा हुआ है।

समाज आज जिस विकट समस्या में आ पहुँचा है वह भविष्य के लिए बेहद कष्ट पूर्ण स्थिती को स्पष्ट करती है। विवाह मिलान के गलत प्रचार के लिए देश भर के पचाँग निर्माता ज्यादा जिम्मेदार हैं। गुण मिलान की एक सारणी बनाकर कोई भी विवाह मिलान करावा देता है। परिणाम पर दृष्टि डालने की कोशिश कोई नहीं करता है। लग्न चक्र में विवाह का साल है नहीं है, योग अच्छे चल रहे हैं नहीं है, ग्रह चाल अच्छी चल रही है नहीं है, आपस में प्राकृतिक रिश्ता लाभ का है नहीं है, आपस में तत्व लाभ देने वाले हैं नहीं है। मूलभूत बातों को अनदेखा किया जाता है जिसके कारण विवाह का संस्कार अपनी गरिमा को नष्ट करता जा रहा है।

इस गुण मिलान सारणी का सबसे नकारात्मक पहलू तब सामने आता है जब कोई कर्म काण्डी भी अपनी दक्षिणा के लालच में केवल बोलते नाम से गुणों का मिलान कर देता है। ऐसे महत्वपूर्ण पहलू का इस प्रकार स्थूल आधार पर किया जाने वाला प्रचार निश्चित तौर पर समाज के लिए हानिकारक है। कुछ लग्न चक्र से गुण नहीं मिलने पर बोलते नाम से गुण मिलान करवा देते हैं। उसके अन्य पहलुओं को पूर्ण रूप से अनदेखा कर देते हैं। इस स्थिती का दोष इस पहलू का प्रचार कर रहे पंचाग निर्माताओं को जाता है।

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र बेहद स्थूल आधारों पर विवाह जैसे अहम् कर्म को करवाकर समाज की भावनाओं को नष्ट कर रहा है। एक विधा को जानने वाले दस ज्योतिषी अपने अनुभव के आधार पर अलग-अलग मत देते हैं। कोई भी सिद्धान्त की बात तो करता नहीं है। अपनी बात गलत निकलने पर शास्त्रों में लिखे हुए की दुआई देने लग जाते है। शास्त्र की भाषा समझ नहीं आती है तो उसका इस्तेमाल क्यों करते है। तत्व को अनदेखा करके अनुभव आधार पर समाज का गलत मार्ग दर्शन कर गुमराह कर रहे हैं।

प्रचलित ज्योतिष में आलोचनात्मक आधार नं0-19

विवाह के सुखों को नष्ट करते योगों का पालन नहीं करना

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र विवाह के सुखों को नष्ट करने वाले योगांे से पूर्ण रूप से अन्जान है। सिद्धान्तों पर कार्य करते इन योगांे से अन्जान होने का एक मात्र कारण सिद्धान्त व अनुभव में अन्तर का आधार है। इन योगांे में से कुछ योगों से प्रचलित ज्योतिष शास्त्र पूर्ण रूप से अन्जान नहीं है। प्रचलित ज्योतिष शास्त्र उनके अर्थ व भावांे से जरूर अन्जान लगता है।

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र जिन महत्वपूर्ण योगांे को प्रभावहीन मानकर विवाह के संस्कार के समय अनदेखा करके समाज को कष्ट देने का कार्य कर रहा है। उनसे द्वि-द्वादश, षड़ाष्टक, चतुर्थ दशम, मंगल के सिद्धान्त से बने भाई-बहन, यात्रा के सिद्धान्त का खण्डन, परछाई योग (जुडँवा) के सिद्धान्त से बने भाई-बहन, प्राकृतिक स्तर का ध्यान नहीं रखना, सूर्य-चन्द्र की युति से बना अर्धमृत योग व जिन्दालाश योग, सम्पूर्णता के योग में तत्व के लोक का ध्यान नहीं रखने के कारण समाज में पारिवारिक जीवन एक संघर्ष बनकर रह गया है। उक्त सभी योगांे के प्रभाव को समझते हैं। विस्तृत जानकारी व प्रभाव विवाह सिद्धान्त में देखें।

प्रचलित ज्योतिष में आलोचनात्मक आधार नं0-20

जुडवाँ के सिद्धान्त के गलत दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र मे जुड़वाँ के रूप उत्पन्न हुए दो लग्नांे का फलित करने के लिए कोई ठोस तर्कसंगत सिद्धान्त नहीं मिलता है। कुछ परिस्थितीयों मे दो से अधिक भी एक साथ उत्पन्न हो जाते हैं इनके लिए तो ज्योतिष में कोई कल्पन्ना भी नहीं मिलती है। समाज का यह हिस्सा ज्योतिष का लाभ नहीं ले पाता है। ज्योतिष शास्त्र की दायरे से कुछ बाहर हो ऐसा इस शास्त्र का मूल आधार स्पष्ट नहीं करता है।

जुड़वाँ के लग्नांे मे हर योग एक जैसे होने के बाद हर क्षेत्र से मिलने वाला प्रभाव अलग क्ँयू होता है। प्रचलित ज्योतिष शास्त्र के मूल आधार को थोड़ी सी गहराई से समझने पर इसका जवाब हाँ मंे मिल जाता है। प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में इस विशेष जुड़वाँ के लिए पूरा सिद्धान्त मिलता है। आज के ज्योतिष समाज नेे अपनी नासमझी के कारण इसके विषय मे प्रश्न चिन्ह बना रखा है।

जुड़वाँ लग्न चक्रों का फलित करने के लिए मूल आधार पर दो तत्वांे के स्वामी ग्रहांे को आधा-आधा माना गया है जिनको आज का ज्योतिष शास्त्र ग्रह का दर्जा भी नहीं देता है। लग्न चक्र की बहुत सी महत्वपूर्ण घटनाओं मंे मुख्य भूमिका निभाने वाले इन दो राहु व केतु को छाया ग्रह माना जाता है। तत्वांे के आधार पर तर्कसंगत वर्गीकरण करते समय नर्क लोक की भूमि तत्व का स्वामी राहु बनता है। स्वर्ग लोक जल तत्व का स्वामी केतु जल तत्व का कारक भी स्पष्ट होता है बाकि सभी ग्रहों के स्वामियांे के चिन्हों मे इन्हीं दोनों को एक चिन्ह का आधा-आधा हिस्सा मिला हुआ है ऐसा क्यों हुआ होगा? इसी बात के जवाब को अपने में छिपाए है जुड़वाँ का सिद्धान्त। इसके पीछे की परी कथा का अर्थ स्पष्ट होते सिद्धान्त स्पष्ट होता है।

किसी भी लग्न के फलित में उसकी कलाआंे का सबसे अधिक महत्व होता है। दोनों लिंगो मे लग्न को हम दो भागो मे बाँट सकते हैं। एक भाग ऊपर का वह जिसमें दिम़ाग रूपी ज्ञान का क्षेत्र होता है। दूसरा भाग नीचे का वह जिसमे लिंग की पहचान के स्वरूप है। लग्न के ऊपर का दिमा़ग वाले हिस्से को केतु कहा जाता है। लग्न के नीचे वाले हिस्से को राहु कहा गया है। दोनों के मिलने पर एक लग्न पूर्ण होता है।

एक गर्भ से कुछ पलांे के अन्तर मे उत्पन्न होने वालो मे जो गर्भ से पहले धरातल पर आता है उसको केतु माना जाए ओर उसके बाद मे आने वाले को राहु मान लिया तो पूर्ण रूप से सटीक फलित प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रकार से दो से अधिक उत्पन्न होने वालो को भी इसी हिसाब से विभक्त करके फलित लिया जा सकता है। प्रभाव के लिए केतु के रूप मे जो प्रथम है उसको दिमा़ग वाला होने के कारण लिंग के प्रति आसक्त पाया जाता है जबकि दूसरे को लिंग वाला होने के कारण दिमा़ग के प्रति आसक्त पाया जाता है। इनके प्रभाव को भी इसी प्रकार से स्पष्ट किया जा सकता है।

आज तक प्रचलित ज्योतिष शास्त्र के विद्वान इस बात को समझनंे का प्रयास नहीं किया लगता है कि राहु केतु को आधा-आधा लेने के पीछे रहस्य क्या था? तत्वांे मे उत्पŸिा चक्र में राहु सूर्य पुत्र बनता है। केतु गुरू के करण का कार्य भार देखता है। दोनांे का अपने से सप्तम् स्थिती मंे रहना और उसके साथ उल्टे चलना भी इनके गहन प्रभाव का स्पष्टीकरण देता है। इन दोनांे के प्रभाव का फलित करते समय विपरित प्रभाव को लिया जाता है। इतने स्पष्ट पहलू को भी केवल तत्व का आधार नहीं होने के कारण पूर्ण रूप समझने मे रही गलती का आभास स्पष्ट हो जाता है।

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र मे जुड़वाँ शब्द का गलत आंकलन करना भी इस सिद्धान्त के लुप्त रहने का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू रहा है। जुड़वाँ का तर्कसंगत सरल सा अर्थ किन्हीं दो का एक जैसे होना तो हो सकता है। एक जैसे होने पर एक तत्व के लग्न वाले, एक तत्व की राशि वाले, एक तत्व के सूर्य वाले दो या दो से अधिक भी तो जुड़वाँ के सिद्धान्त के तहत तो कार्यशील रहेगें। इन्हीं दो में जब कोई तीसरा आता है तब वह दोनांे के मध्य होने के कारण अपने को स्पष्ट नहीं करने के कारण नष्ट होने की दिशा में चलना शुरू कर देता है। जुड़वाँ के इस सिद्धान्त की कमी के कारण समाज कई लाइलाज रोगों से युक्त बना हुआ उन्हंे बर्दाशत करने के लिए बाध्य बना हुआ है। समाज के कष्टों का दोष केवल प्रचलित ज्योतिष को जाता है।

ज्योतिष शास्त्र के तत्वांे का मूल आधार को सही रूप से नहीं लेने के कारण इस शास्त्र से शतप्रतिशत फलित लेने की बात किसी को सत्य नहीं लगती है। ज्योतिष समाज के गलत दृष्टि कोण दोषी है। तत्व के मूल आधार पर जुड़वाँ के फलित का रहस्य खुलता है जिसे प्रचलित ज्योतिष शास्त्र जानता भी नहीं है।

प्रचलित ज्योतिष में आलोचनात्मक आधार नं0-21

मंगल के सिद्धान्त के गलत दृष्टिकोण का स्पष्टीकरण

प्रचलित ज्योतिष के गलत दृष्टिकोण का सबसे स्पष्ट उदाहरणों में से एक मंगल का नाम है। मंगल के एक शब्द मंगलिक से समाज का हर वर्ग जानकारी रखता है। समाज का एक बहुत बड़ा भाग इस शब्द को सुनते परेशान होकर रह जाता है। इस शब्द का डर इतना बढा दिये जाने के बाद इस शब्द का अर्थ कष्ट देता है वहाँ उसको माना नहीं जाता है। जिसे देखांे व मंगलिक है कोई कम अंश का है तो कोई ज्यादा अंश का है। हर कोई दूसरे के बताए मंगलिक को किसी न किसी रूप मे परिहार को दिखाकर उसके कष्टप्रद प्रभाव को नष्ट हुआ भी बता देता है।

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र का इस्तेमाल करने वालों के हिसाब को देखा जाए तो हर दूसरा लग्न चक्र मंगलिक बैठता है। लग्न मे मंगल होने से, चतुर्थ भाव मे मंगल होने से, सप्तम् भाव में मंगल होने से, अष्टम् भाव मे मंगलिक होने से, द्वादश भाव में मंगल होने से लग्न चक्र को कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में मंगलिक बता दिया जाता है। इसमें तत्वों का कोई ध्यान नहीं रखा जाता है। मंगलिक पुर्लिंग लग्न चक्र के लिए मंगलिक स्त्रीलिंग लग्न का होना बेहद जरूरी कार्य बता दिया जाता है।

मंगलिक लग्न चक्र में हर कोई अपने हिसाब से कहीं गुरू की दृष्टि से तो कहीं चन्द्रमा की युति से तो कहीं शनि की दृष्टि से इस योग के प्रभाव को कहीं कम तो कहीं समाप्त बता देते हैं। इस प्रकार के प्रयासांे से समाज का विश्वास इससे हटने लगा है। मंगलिक लग्न चक्र के लिए मंगलिक लग्न चक्र को ढूँढना बेहद कठिन कार्य सिद्ध होता है। कायदे से देखा जाए तो प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में इस शब्द के अर्थ का अनर्थ कर दिया गया है। जो स्थिती कष्टप्रद नहीं हैं उसको तो कष्टप्रद बता दिया जाता है। कायदे मे कष्ट देने वाली स्थिती है उसको अन्जाने मे अनदेखा कर दिया जाता है।

प्रचलित ज्योतिष मे मंगलिक स्पष्ट करने का तरीका गलत है उस पर मंगलिक से मंगलिक का योग करना भी गलत परिणाम देता है। स्त्रीलिंग व पुर्लिंग का योग एक दूसरे के पूरक के रूप मे होना तर्कसंगत बात है जो यहाँ दिखाई नहीं देती है। लग्न चक्र मंगलिक है या नहीं है इस बात को स्पष्ट करना अपने आपमें एक कष्ट के रूप मे आज के समाज के सामने खडा है।

कुल 12 लग्न चक्रों में केवल एक लग्न चक्र पर मंगलिक होने के ठोस तर्कसंगत कारण मिलते हैं। जिस पर वर्तमान मापदण्डांे के अनुसार मंगल की स्थिती नहीं होने पर भी मंगलिक बनता है। इस लग्न चक्र पर मंगल द्वादश व सप्तम् भाव का स्वामी होकर लग्न को कष्ट देने का कार्य करता है। यह स्थिती कुल 12 में से केवल इसी लग्न चक्र पर बनती है। वृष में मंगल इस स्थिती को बनाता है जिसके कारण लग्न चक्र के कष्टप्रद प्रभाव के परिणाम स्वरूप अपने योग साथी के बिना रहना पड़ता है।

मेष के अग्नि तत्व के मंगल के रूप मंे कारक होकर द्वादश भाव का स्वामी होता है। सप्तम् भाव मे जल तत्व के रूप में करण का कष्टप्रद प्रभाव देता है। द्वादश व सप्तम् दोनांे भावों का स्वामी होने पर मंगलिक योग बनता है जो विपरित लिंग से सीधे कष्ट दिलवाता है।

उदाहरण के लिए कर्क लग्न अंक 4 पर देखें तो वहाँ मंगल दशम् वा पंचम् का स्वामी बनता है। इन दोनों भावों का विपरित लिंग से विवाह के अर्थो मे कोई योग नहीं है फिर इस लग्न पर मंगल की किसी भी स्थिती पर मंगलिक योग कैसे हो सकता है। सिंह लग्न अंक 5 पर भाग्य भाव व चतुर्थ का स्वामी बैठता है इस स्थिती में भी मंगलिक योग कैसे बनाया जा सकता है। कुम्भ लग्न अंक 11 पर तृतीय् भाव व दशम् भाव का स्वामी बनता है। इस स्थिती में भी मंगलिक योग बनाना पूर्ण से अकर्तसंगत रहता है।

लग्न चक्र पर प्रचलित ज्योतिष जब मंगल की बात करता है तो वह मेष के मंगल की बात करता है या वृश्चिक के मंगल की इस बात को वह स्वयं भी नहीं जानते हैं। बेकार में मंगलिक शब्द के अर्थ का अनर्थ करके समाज को गुमराह व भयभीत करने का कार्य कर रहा है। बिना आधार की बातांे का प्रचार व प्रसार करने के कार्य को किसी भी स्थिती में समाज के हित में किसी भी हालात में नहीं पाया जाता है।

वृष लग्न पर मंगलिक शब्द का अर्थ स्पष्ट होता है। कायदे में केवल इसे मंगल ग्रह से लेना पूर्ण रूप से अतर्कसंगत है। जिस योग का अर्थ नहीं है उसका परिहार अपने में परिहास का विषय बन जाता है। ज्योतिष शास्त्र के तत्वांे के मूल आधार से समझनंे पर सटीक फलित प्राप्त हो सकता है।

अन्य महत्वपूर्ण पहलू

  • सूर्य-चन्द्र की युति के प्रभाव से अन्जान होना।
  • कालसर्प की परिभाषा से अन्जान होना।

प्रचलित ज्योतिष में आलोचनात्मक आधार नं0-22

सूर्य-चन्द्र की युति के प्रभाव से अन्जान होना

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र मे साधारण रूप से एक मान्यता है कि सूर्य कभी अस्त नहीं होता है। यह मान्यता पूर्ण रूप से अतर्कसंगत सूर्य के प्रभाव के बदलते रहने के कारण भी गलत सिद्ध हो जाती है। सूर्य की दक्षिणयान् की स्थिती के मध्य में जब सूर्य कन्या, तुला व वृश्चिक से गुजर रहा होता है तब सूर्य की स्थिती अस्त की होती है। ऐसी स्थिती प्रचलित ज्योतिष शास्त्र की महत्वपूर्ण त्रुटी की ओर संकेत करती है।

चन्द्रमा सूर्य के साथ एक तत्व की राशि मंे होने पर चन्द्रमा इसमें अस्त होकर अमावस्या की स्थिती को स्पष्ट करता है। अमावस्या की स्थिती में चन्द्रमा आसमान से विलुप्त हो जाता है। विलुप्त होने के कारण उसका प्रभाव भी दिखाई नहीं देता है। चन्द्रमा के प्रभावहीन होने के कारण समुद्र के जल की ज्वारभाटा की स्थिती स्पष्ट करता है। उक्त स्थिती तो केवल चन्द्रमा व सूर्य की युति से निर्मित होती है।

जब इसको तत्वांे के आधार पर देखते हैं तो यह तथ्य स्पष्ट होता है कि भूमि व जल तत्व मंे सूर्य भी प्रभावहीन होकर रह जाता है। इस बात पर भी एक मान्यता है कि सूर्य के प्रकाश के आधार पर चन्द्रमा चमकता है। चन्द्रमा का अपना कोई प्रकाश नहीं होता है। ऐसी स्थिती मंे जब चन्द्रमा को प्रकाश देने वाला सूर्य कष्ट पूर्ण हो तो चन्द्रमा की क्या स्थिती हो सकती है। भूमि तत्व व जल तत्व में सूर्य नष्ट प्रायः स्थिती में होने के कारण चन्द्रमा को अपने से जाने वाली प्रकाश की मदद नहीं दे पाता है जिसके कारण इन दिनांे होने वाली सन्तानांे पर भी इसका पूर्ण रूप से नकारात्मक प्रभाव दिखाई देता है।

अग्नि तत्वांे मंे सूर्य व चन्द्रमा की युति से केवल अमावस्या के समान अर्धमृत योग का निर्माण होता है। ऐसी स्थिती में चन्द्रमा रूपी मन की कोई हरकत नहीं होती है। ऐसे मंे सोचने का कार्य नहीं किया जाता है। इसी प्रकार से भूमि व जल तत्वांे मंे आत्मा रूपी सूर्य भी चन्द्रमा रूपी मन के साथ कार्यहीनता की स्थिती को स्पष्ट करता है। जबकि प्रचलित ज्योतिष शास्त्र इस तथ्य या सिद्धान्त से पूर्ण रूप से अन्जान रहा है इसके प्रभाव के नकारात्मक पहलू से अन्जान होने के कारण समाज अनसुलझंे कष्टो मे फँसा रहने पर मजबूर है।

सूर्य का तत्व अग्नि है। अग्नि तत्व की भूमि तत्व से स्वभाविक रूप से शत्रुता है। भूमि व अग्नि तत्व के साधारण मिश्रण से भी इस बात को स्पष्ट किया जा सकता है। इसमें अग्नि को भूमि तत्व से पहले व ज्यादा मात्र मंे हानि प्राप्त होती है। जल तत्व मे भी सूर्य के अग्नि तत्व की स्थिती कष्टप्रद रहती है। इसमें जल तत्व को पहले व ज्यादा कष्ट प्राप्त होता है। जल तत्वांे में से एक तत्व का स्वामी चन्द्रमा भी है। अग्नि तत्व मे अग्नि तत्व का सूर्य अपने श्रेष्ठ प्रभाव को प्रकट करता है। इसमे जल तत्व के चन्द्रमा की स्थिती मृत प्रायः होकर रह जाती है। जल की मात्र से दो गुणा मात्र अग्नि तत्व की होने के कारण ऐसा होता है।

अग्नि तत्व अन्य भूमि, वायु व जल तत्व का कारक होने के अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है। जब अग्नि तत्व के किसी भाव पर या किसी स्वामी पर कष्ट आता है तो वह कष्ट उन तक सीमित नहीं रहकर आगे की तीन पर भी स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। अग्नि तत्व के भाव पर या राशि पर कष्ट का प्रभाव अन्य अग्नि तत्व भाव व राशियों पर भी नकारात्मक प्रभाव देता है।

जब तक सूर्य व चन्द्रमा की युति के प्रभाव को तत्व के अनुसार नहीं लिया जाएगा इनका असल प्रभाव प्राप्त नहीं किया जा सकता है। इन दोनों की युति के प्रभाव स्वरूप अग्नि तत्व मे अर्धमृत योग बनता है। इन दोनों की युति के प्रभाव स्वरूप भूमि व जल तत्व मे मृत योग (जिन्दालाश) बनता है। दोनांे स्थिती कई अनसुलझंे प्रश्न चिन्हांे मे फँसी होने के कारण इस शास्त्र के सत्य को नष्ट करने का कार्य करती है।

दोनांे की युति वालांे को इसी स्थिती वाले के साथ परिणय् संस्कार करके समाज के एक तरफा अनजाने कष्ट से मुक्त रखा जा सकता है। इस स्थिती से अवगत होने से भी कष्टांे को कम किया जा सकता है। कष्ट की उत्पत्ति अज्ञान से होती है। ज्ञान एक औषधी की भाँति कार्य करता है। ऐसी स्थिती की जानकारी होने पर ऐसी स्थिती का होने के बाद कोई भी अपनी स्थिती को दूसरे पर स्पष्ट करके उसकी अपने प्रति दुविधा का निवारण कर सकता है। इस प्राकृतिकता से भरपूर सिद्धान्त से अन्जान होना प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में तर्क संगत मूल आधार से उत्पन्न हुई त्रुटी को स्पष्ट करता है। इस शास्त्र की कोई भी कमी इस शास्त्र के लिए कष्टप्रद स्थिती को उत्पन्न करने के साथ समाज को कष्ट मेे डाल कर रखने का कार्य करती है। इस सिद्धान्त के लग्न चक्र के 12 भावो पर अलग-अलग प्रभाव को स्पष्ट किया जा सकता है।

प्रचलित ज्योतिष में आलोचनात्मक आधार नं0-23

कालसर्प की परिभाषा से अन्जान होना

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र ने इस शब्द के साथ छेड़छाड़ करके इसके असल अर्थ को नष्ट कर दिया है। कालसर्प शब्द का अर्थ मात्र दो लग्नांे पर कार्यशील होता है। इस शब्द के पीछे के तर्कों को देखने के हिसाब से समाज का अधिकाँश भाग कालसर्प से भय युक्त दिखाई पड़ता है। समाज का कुछ भाग इस शब्द के सत्य पर प्रश्न चिन्ह लगाकर बात करता है। हकीकत में जो इस शब्द के अर्थ रूपी योग में फँसे भी हुए है उनको कोई नहीं बता पाता कि वे कष्ट में इस कारण से है। कुछ ऐसी विषम परिस्थितीयांे के कारण आज यह शब्द परिहास का विषय बनकर रहा गया है। प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में इससे कष्टप्रद स्थिती ओर क्या हो सकती है कि सरल से शब्द का अर्थ भी वह सही नहीं निकाल पाता है।

प्रचलित ज्योतिष शास्त्र में कालसर्प राहु केतु दो ग्रह बनाते है। अन्य ग्रहों की अपेक्षा दोनांे ग्रह सदैव वक्री चक्र लगाते हुए अपनी परिक्रमा करते रहते हैं। एक साधारण मान्यता के तहत राहु केतु के मध्य में अन्य सभी ग्रह आने पर यह योग कार्य करता है। राहु केतु की ओर वक्री चलता हुआ भी माना जाता है। अनुभव के आधार पर राहु केतु के इस योग को बडे विचित्र रूप मे स्पष्ट कर दिया जाता है। कोई तो मानता है कि राहु से केतु के मध्य मे अन्य सभी ग्रह आने पर इस योग का प्रभाव प्राप्त होता है। कुछ उदाहरण केतु से राहु के मध्य आए ग्रहों के कारण भी इस योग को कार्यशील हुआ मानते है। राहु केतु के वक्री चलने के सिद्धान्त के मध्य इनका यह दृष्टिकोण एक स्थिती पर तो स्वयं कट जाता है।

इनके कथन को पूर्ण सत्य भी मान लिया जाए तो इन दोनांे के वक्री चलने के एक सिद्धान्त के तहत तो इनके दो मत कार्य कर नहीं सकते है। ये दोनांेे विपरित बातंे तत्व पर नहीं है, तत्व के स्वामी राशियों के स्वामी ग्रहो पर आधारित है। राहु से केतु के मध्य वाली बात इन दोनों के वक्री चलने से कुछ मेल तो खाती है पर पूर्ण सत्य उस स्थिती से सिद्धान्त नहीं होने के कारण बहुत दूर है।

ज्योतिष के शतप्रतिशत फलित का आधार उसके तत्व के मूल आधार से जुड़ा हुआ है। जबकि प्रचलित ज्योतिष शास्त्र इसको मूल आधार से जोड़कर नहीं चलता है। इसके कारण भी इसके अर्थ का अनर्थ बना हुआ है। फलित का कोई ठोस तर्क पूर्ण तरीका नहीं होने के कारण ज्योतिष शास्त्र अपनी शतप्रतिशतता के स्थान पर प्रश्न चिन्हांे के साथ अपने को सिद्ध करने के लिए संघर्ष कर रहा है। तत्वांे के तर्कसंगत आधार पर कालसर्प की परिभाषा व किस स्थिती पर या किस लग्न पर कार्यशील होता है।

कालसर्प दो शब्दांे काल व सर्प से मिलकर बना हुआ है। काल का अर्थ समय व सर्प का अर्थ नाग लिया जा सकता है। इस शब्द की उत्पत्ति का कारण अग्नि तत्व का मेष लग्न व वायु तत्व का तुला लग्न हैं। अग्नि तत्व के मेष लग्न पर भूमि तत्व कन्या राशि का छठा भाव बीमारी के भाव को स्पष्ट करता है। इसी लग्न पर जल तत्व मीन राशि का द्वादश भाव नुकसान के भाव को स्पष्ट करता है। जब दोनों के भावांे के तत्वांे का योग किया जाता है तो परिणाम स्वरूप अष्टम् भाव का तत्व का निर्माण हो जाता है। जिसको बदलाव मृत्यु का भाव भी माना जाता है। ऐसी स्थिती तुला लग्न पर यह भाव बनाते हैं। इनके अलावा तीसरा कोई लग्न नहीं जिस पर इस प्रकार की स्थिती बनती हो। इस योग के परिणाम स्वरूप इनको बीमारी व नुकसान सदैव घेरकर रखते हैं। मेष लग्न पर ये दोनांे मृत्यु तक देती है जबकि तुला लग्न पर एकत्र धन भाव का अभाव बना रहता है।

प्रचलित ज्योतिष का इस्तेमाल करने वाले इस साधारण से शब्द के अर्थ को स्पष्ट कर पाने में कितने सफल है इस बात को ओर स्पष्ट करने की यहाँ आवश्कता समाप्त हो जाती है। ज्योतिष की प्राकृतिकता से दूरी का अन्दाजा भी से स्पष्ट रूप से लगाया जा सकता है। इस शब्द की शाब्दिक परिभाषा तो सही दी जा सकती है। ज्योतिष के लग्न चक्र पर सही व्याख्या नहीं दी जा सकती है। समाज का एक बहुत बड़े भाग को डराकर रखनें का कार्य तो प्रचलित ज्योतिष जरूर करता है इसका उपचार किसी के पास भी नहीं है। जब बीमारी देखने का तरीका गलत हो तो उपचार सही कैसा हो सकता है।

शब्द के अर्थ को स्पष्ट करने वाले दो नाग होते है। भूमि तत्व की कन्या राशि व जल तत्व की मीन राशि के लग्न, राशि, व सूर्य वाले लग्न चक्र मेष व तुला लग्न, राशि व सूर्य पर अपना प्रभाव प्रकट करते है। किसी अन्य पर इनका अलग अलग प्रभाव होता है। किसी भी शब्द के अर्थ के लिए उसके सभी पहलुओं से अवगत होना बेहद जरूरी पहलू है जो प्रचलित ज्योतिष मे सिद्धान्त की कमी के साथ से नहीं है।


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