• Font size:
  • Decrease
  • Reset
  • Increase

02 January 2012

वास्तुदोष- कारण, निवारण और उपाय

हर व्यक्ति अपने घर को खूबसूरत रखना चाहता है। करीने से सजा हुआ घर के व्यक्तित्व में चार चांद लगा देता है, सुंदर घर सभ्य और सुशिक्षित होने का सबूत है। आज के युवा ड्राइंग रूम और लिविंग रूम को सजाने में काफी दिलचस्पी लेने लगे हैं। घर को सजाना कोई फैशन नहीं है, बल्कि एक जरूरत है।

आज कल वास्तुशास्त्र का प्रचलन खूब है और तथाकथित वास्तुशास्त्रियों  की खूब चांदी है वह लोगों को बेवकूफ बना कर खूब जोरों से चांदी कूट रहे है यहाँ पर वास्तुदोष का निवारण के उपाय  दिये  जा रहें  है इसे अपना कर के, आप अपने घर के वास्तु दोषों को दूर कर के अपने यहाँ मंगलमय वातावरण कर सकते हैंघर में वास्तुदोष होने पर, उचित यही होता है कि उसे वास्तुशास्त्र के अनुसार ठीक कर ले, यथासंभव घर के अंदर तोड़-फोड ना करे; इससे वास्तुभंग का दोष होता है।

यदि हम घर की सजावट, रंग-रोगन आदि ज्योतिष एवं वास्तु के नियमों के अनुसार करें तो घर की सुंदरता तो बढ़ेगी ही, हमारे घर-आंगन में खुशियां भर जाएंगी। जैसे-

- पूजा घर में फर्श के लिए हल्के पीले या सफेद रंग के संगमरमर का उपयोग श्रेष्ठ माना है।

- कक्ष की दीवारों या पर्दों का रंग भी सफेद, हल्का पीला, हल्का क्रीम, हल्का आसमानी रखें।

- हल्का नारंगी, केसरिया या भगवा रंग भी अच्छा लगता है। इन रंगों का इस्तेमाल करने से पूजा घर का वातावरण शुभ व कल्याणप्रद होता है।

- माता लक्ष्मी को बिल्ब पत्र एवं कमल पुष्प अतिप्रिय हैं। इस पुष्प से आप अपने पूजा घर को सजा सकते हैं।

यदि नीचे दिए जा रहे उपाय करें और वास्तुदोष का निवारण स्वयं करें--

(यदि फिर भी इन उपायों से कुछ लाभ ना हो तो अपने किसी विश्वासपात्र  वास्तुशास्त्री से परामर्श करें.)...

1 घर में अखंड रूप से 9 बार श्री रामचरितमानस का पाठ करने से वास्तुदोष का निवारण होता है।

1 घर में 9 दिन तक अखंड कीर्तन करने से वास्तुजनित दोषों का निवारण होता है।

2 हाटकेश्वर-क्षेत्र में वास्तुपद नामक तीर्थ के दर्शन मात्र से ही वास्तुजनित दोषों का निवारण होता है।

3मुख्य द्धार के उपर सिंदूर से नो अंगुल लंबा नो अंगुल चोडा स्वास्तिक का चिन्ह बनाये और जहाँ-२ भी वास्तु दोष है वहाँ इस चिन्ह का निर्माण करें वास्तुदोष का निवारण हो जाता है।

4 रसोई घर गलत स्थान पर हो तो अग्निकोण में एक बल्ब लगा दें और सुबह-शाम अनिवार्य रूप से जलाये।                                                                                                                                                                                 ६  द्धार दोष और वेध दोष दूर करने के लिए शंख, सीप, समुद्र झाग, कौड़ी लाल कपड़े में या मोली में बांधकर दरवाजे पर लटकायें।

5 बीम के दोष को शांत करने के लिए बीम को सीलिंग टायल्स से ढंक दें। बीम के दोनों ओर बांस की बांसुरी लगायें।

6 घर के दरवाजे पर घोड़े की नाल (लोहे की) लगायें। यह अपने आप गिरी होनी चाहिए।

7 घर के सभी प्रकार के वास्तु दोष दूर करने के लिए मुख्य द्धार पर एक ओर केले का वृक्ष दूसरी ओर तुलसी का पौधा गमले में लगायें।

8 दुकान की शुभता बढ़ाने के लिए प्रवेश द्धार के दोनों ओर गणपति की मूर्ति या स्टिकर लगायें। एक गणपति की दृष्टि दुकान पर पड़ेगी, दूसरे गणपति की बाहर की ओर।

9 यदि दुकान में चोरी होती हो या अग्नि लगती हो तो भौम यंत्र की स्थापना करें। यह यंत्र पूर्वोत्तर कोण या पूर्व दिशा में, फर्श से नीचे दो फीट गहरा गङ्ढा खोदकर स्थापित किया जाता है।

10 यदि पलाट खरीदे हुये बहुत समय हो गया हो और मकान बनने का योग ना आ रहा हो तो उस प्लाट में अनार का पौधा पुष्य नक्षत्र में लगायें।

12 अगर आपका घर चारों ओर बड़े मकानों से घिरा हो तो उनके बीच बांस का लम्बा फ्लेग लगायें या कोई बहुत ऊंचा बढ़ने वाला पेड़ लगायें।

13 फैक्ट्री-कारखाने के उद्घाटन के समय चांदी का सर्प पूर्व दिशा में जमीन में स्थापित करें।

14  अपने घर के उतर के कोण में तुलसी का पौधा लगाएं

15  हल्दी को जल में घोलकर एक पान के पत्ते की सहायता से अपने सम्पूर्ण घर में छिडकाव करें. इससे घर में लक्ष्मी का वास तथा शांति भी बनी रहती है।

16 अपने घर के मन्दिर में घी का एक दीपक नियमित जलाएं तथा शंख की ध्वनि तीन बार सुबह और शाम के समय करने से नकारात्मक ऊर्जा घर से बहार निकलती है।

17 घर में सफाई हेतु रखी झाडू को रास्ते के पास नहीं रखें. यदि झाडू के बार-बार पैर का स्पर्थ होता है, तो यह धन-नाश का कारण होता है. झाडू के ऊपर कोई वजनदार वास्तु भी नहीं रखें।

18 अपने घर में दीवारों पर सुन्दर, हरियाली से युक्त और मन को प्रसन्न करने वाले चित्र लगाएं. इससे घर के मुखिया को होने वाली मानसिक परेशानियों से मुक्ति मिलती है।

19 वास्तुदोष के कारण यदि घर में किसी सदस्य को रात में नींद नहीं आती या स्वभाव चिडचिडा रहता हो, तो उसे दक्षिण दिशा की तरफ सिर करके शयन कराएं. इससे उसके स्वभाव में बदलाव होगा और अनिद्रा की स्थिति में भी सुधार होगा।

20 अपने घर के ईशान कोण को साफ़ सुथरा और खुला रखें. इससे घर में शुभत्व की वृद्धि होती है।

21 अपने घर के मन्दिर में देवी-देवताओं पर चढ़ाए गए पुष्प-हार दूसरे दिन हटा देने चाहिए और भगवान को नए पुष्प-हार अर्पित करने चाहिए।

22  घर के उत्तर-पूर्व में कभी भी कचरा इकट्ठा न होने दें और न ही इधर भारी मशीनरी रखें।

23 अपने वंश की उन्नति के लिये घर के मुख्य द्धार पर अशोक के वृक्ष दोनों तरफ लगाएं।

24 यदि आपके मकान में उत्तर दिशा में स्टोररूम है, तो उसे यहाँ से हटा दें. इस स्टोररूम को अपने घर के पश्चिम भाग या नैऋत्य कोण में स्थापित करें।

25 घर में उत्पन्न वास्तुदोष घर के मुखिया को कष्टदायक होते हैं. इसके निवारण के लिये घर के मुखिया को सातमुखी रूद्राक्ष धारण करना चाहिए।

26 यदि आपके घर का मुख्य द्धार दक्षिणमुखी है, तो यह भी मुखिया के के लिये हानिकारक होता है. इसके लिये मुख्य द्धार पर श्वेतार्क गणपति की स्थापना करनी चाहिए।

27 अपने घर के पूजा घर में देवताओं के चित्र भूलकर भी आमने-सामने नहीं रखने चाहिए इससे बड़ा दोष उत्पन्न होता है।

28 अपने घर के ईशान कोण में स्थित पूजा-घर में अपने बहुमूल्य वस्तुएँ नहीं छिपानी चाहिए।

29 पूजाकक्ष की दीवारों का रंग सफ़ेद हल्का पीला अथवा हल्का नीला होना चाहिए।

30 यदि आपके रसोई घर में रेफ्रिजरेटर नैऋत्य कोण में रखा है, तो इसे वहां से हटाकर उत्तर या पश्चिम में रखें।

31 दीपावली अथवा अन्य किसी शुभ मुहूर्त में अपने घर में पूजास्थल में वास्तुदोष नाशक  कवच की स्थापना करें और नित्य इसकी पूजा करें. इस कवच को दोषयुक्त स्थान पर भी स्थापित करके आप वास्तुदोषों से सरलता से मुक्ति पा सकते हैं।

32 अपने घर में ईशान कोण अथवा ब्रह्मस्थल में स्फटिक श्रीयंत्र की शुभ मुहूर्त में स्थापना करें. यह यन्त्र लक्ष्मीप्रदायक भी होता ही है, साथ ही साथ घर में स्थित वास्तुदोषों का भी निवारण करता है।

33 प्रातःकाल के समय एक कंडे/ उपले  पर थोड़ी अग्नि जलाकर उस पर थोड़ी गुग्गल रखें और ‘ॐ नारायणाय नम:’ मंत्र का उच्चारण करते हुए तीन बार घी की कुछ बूँदें डालें. अब गुग्गल से जो धुँआ  उत्पन्न हो, उसे अपने घर के प्रत्येक कमरे में जाने दें. इससे घर की नकारात्मक ऊर्जा ख़त्म होगी और वास्तुदोषों का नाश होगा।

34 घर में किसी भी कमरे में सूखे हुए पुष्प ना रखें . यदि छोटे गुलदस्ते में रखे हुए फूल सूख जाएं, तो  नए पुष्प  लगा दें और सूखे पुष्पों को निकालकर बाहर फेंक दें।

35  सुबह के समय थोड़ी देर तक निरंतर बजने वाली  गायत्री मंत्र की धुन चलने दें. इसके अतिरिक्त कोई अन्य धुन भी आप बजा सकते हैं।

36 सायंकाल के समय घर के सदस्य सामूहिक आरती करें. इससे भी वास्तुदोष दूर होते हैं।

37 अगर आपके घर के पास कोई नाला या कोई नदी  इस प्रकार बहती हो कि उसके बहाव की दिशा उत्तर-पूर्व को छोड़कर कोई और दिशा में है, या उसका घुमाव घडी कि विपरीत दिशा में  है, तो यह वास्तु दोष है। इसका निवारण यह है कि घर के उत्तर-पूर्व कोने में पश्चिम की ओर मुख किए हुए, नृत्य करते हुए गणेश की मूर्ति रखें।

38 यदि घर में जल निकालने का स्थान / बोरिंग गलत दिशा में हो तो भवन में दक्षिण-पश्चिम की ओर मुख किए हुए पंचमुखी हनुमानजी की तस्वीर लगाएं।

39 यदि आपके भवन के ऊपर से विद्धयुत तरंगे (उच्च सवेंदी) तार गुजरती हो तो इन तारो से प्रवाहित होने वाली ऊर्जा का घर से निकलने वाली ऊर्जा से प्रतिरोध होता है। इस प्रकार के भवन में नींबुओ से भरी प्लास्टिक पाईप को फर्श से सटाकर  या थोड़ा जमीन में गाड़ कर घर के इस पार से उस पार बिछा दें, नींबुओं से भरी पाईप दोनों और  कम-से-कम तीन फिट बाहर निकली रहे।

40 यदि भवन में प्रवेश करते ही सामने खाली  दीवार पड़े तो उस पर भावभंगिमापूर्ण गणेशजी की तस्वीर लगाएं या स्वास्तिक यंत्र का प्रयोग करके घर के ऊर्जा वृत्तों को बढ़ाया जा सकता है। पर, कुशल वास्तु कारीगर के द्वारा ही करवाना चाहिए।

41 अगर टॉयलेट घर के पूर्वी कोने में है तो  टॉयलेट शीट इस प्रकार लगवाएं कि उस पर उत्तर की ओर मुख करके बैठ सकें या पश्चिम की ओर।

इस प्रकार घर की नकारात्मक ऊर्जा की जगह सकारात्मक ऊर्जा ले लेगी और सारे वास्तु दोष भी दूर हो जाएंगे। फिर आप जिस कार्य में हाथ डालेंगे, आपको सफलता निश्चित रूप से मिलेगी।

वास्तु के अनुसार निम्न बातों का भी ध्यान रखें ----

1) घर के प्रवेश द्वार पर स्वस्तिक अथवा 'ॐ' की आकृति लगाने से घर-परिवार में सुख-शांति बनी रहती है।

2) जिस भूखंड या मकान पर मंदिर की पीठ पड़ती है, वहाँ रहने वाले दिन-ब-दिन आर्थिक व शारीरिक परेशानियों में घिरते रहते है।

3) समृद्धि की प्राप्ति के लिए नार्थ-ईस्ट दिशा में पानी का कलश अवश्य रखना चाहिए।

4) घर में ऊर्जात्मक वातावरण बनाने में सूर्य की रोशनी का विशेष महत्व होता है इसलिए घर की आंतरिक साज-सज्जा ऐसी होनी चाहिए कि सूर्य की रोशनी घर में पर्याप्त रूप में प्रवेश करे।

5) घर में कलह अथवा अशांति का वातावरण हो तो ड्राइंग रूम में फूलों का गुलदस्ता रखना श्रेष्ठ होता है।

6) अशुद्ध वस्त्रों को घर के प्रवेश द्वार के मध्य में नहीं रखना चाहिए।

7) वास्तु के अनुसार रसोईघर में देवस्थान नहीं होना चाहिए।

8) गृहस्थ के बेडरूम में भगवान के चित्र अथवा धार्मिक महत्व की वस्तुएँ नहीं लगी होना चाहिए।

9) घर में देवस्थान की दीवार से शौचालय की दीवार का संपर्क नहीं होना चाहिए।

पंडित दयानन्द शास्त्री-

Mobile. 09024390067 & 09711060179

Read more

एग्ज़ाम पेपर के नाम पर ठगी, गिरोह का सरगना गिरफ्तार

जयपुर॥ परीक्षा से पहले ही पेपर आउट कर ठगी करने वाले गिरोह के सरगना को एसओजी ने गिरफ्तार कर लिया। यह गिरोह राजस्थान लोक सेवा आयोग की ओर से आयोजित नर्सिग भर्ती परीक्षा का पेपर परीक्षा से पहले उपलब्ध कराने का झांसा देकर ठगी कर रहा था।

गिरोह के सात लोगों पहले ही एसओजी की गिरफ्त में आ गए थे। एसओजी के एडीजी कपिल गर्ग ने बताया कि गिरफ्तार आरोपी प्रमोद गुर्जर उर्फ प्रशांत (30) दौसा में महवा के पास स्थित कुतकपुर गांव का रहने वाला है। इस मामले में गिरोह के मिथलेश कुमार, चंद्रकांत मीणा, कुरेश कुमार, हर्ष वर्धन, दामोदर, अजय सिंह गुर्जर तथा रामचंद जाट को पूर्व में ही गिरफ्तार कर लिया गया था।

Read more

क्या ज्योतिष एवं वास्तु का सम्बन्ध हें?

भवन निर्माण का कार्य भी एक धार्मिक कार्य के रूप में माना जाता है।  भूमि पूजन से लेकर गृहे प्रवेश तक के हर कार्य को धार्मिक भावनाओं से जोड़ा गया है।  महर्षि नारद जी ने स्वयं कहा है कि जो वास्तु का पूजन करता है, वह नितोग, पुत्र, धन-धान्य आदि से परिपूर्ण होता है।  पृथ्वी, जल, आकाश, अग्नि इन पांच तत्वों संतुलित रखना प्राकृतिक नुयम है और वास्तु अनुकूल भवन बनाने का मुख्य उद्देश्य भी यही होता है।

वास्तु का ज्योतिष से गहरा रिश्ता है।  ज्योतिष शास्त्र का मानना है कि मनुष्य के जीवन पर नवग्रहों का पूरा प्रभाव होता है।  वास्तु शास्त्र में इन ग्रहों की स्थितियों का पूरा ध्यान रखा जाता है।  वास्तु के सिद्धांतों के अनुसार भवन का निर्माण कराकर आप उत्तरी ध्रुव से चलने वाली चुम्बकीय ऊर्जा, सूर्य के प्रकाश में मोजूद अल्ट्रा वायलेट रेज और इन्फ्रारेड रेज, गुरुत्वाकर्षण – शक्ति तथा अनेक अदृश्य ब्रह्मांडीय तत्व जो मनुष्य को प्रभावित करते है के शुभ परिणाम प्राप्त कर सकते है। और अनिष्टकारी प्रभावों से अपनी रक्षा भी कर सकते है।  वास्तु शास्त्र में दिशाओं का सबसे अधिक महत्व है।  सम्पूर्ण वास्तु शास्त्र दिशाओं पर ही निर्भर होता है।  क्योंकि वास्तु की दृष्टि में हर दिशा का अपना एक अलग ही महत्व है।

कोई भी विज्ञान अथवा कला जब तक आध्यात्म से किसी रूप में नहीं जुड़ती वह मानव कल्याण के योग्य नहीं होती।  आध्यात्म से शून्य कोई भी विज्ञान कोरा व सूखा है जो शुष्क लकड़ी के समान केवल जलने योग्य है।  विश्वकर्माप्रकाश नामक ग्रंथ के अनुसार भी (वास्तु होम ततः कुर्यात) अर्थात नौ ग्रहों के हवन के पश्चात ही वास्तु हवन करना चाहिए।  आप सभी जानते हैं की सूर्य चन्द्र मंगल आदि ग्रह तथा वायु जल पृथ्वी अग्नि व आकाश आदि पंचतत्व मनुष्य को स्वस्थ दीर्घायु एवं जीवनशक्ति प्रदान करने के लिए परम आवश्यक हैं।

सूर्य समस्त सृष्टि को ऊर्जा एवं प्रकाश प्रदान करता है।  सूर्य के बिना तो मनुष्य जीवन की कल्पना भी नहीं की जा सकती।  सूर्य के प्रचंड प्रकाश में रोगकारी तत्वों को नष्ट करने की विशेष क्षमता होती है।  मनुष्य का शरीर भी पृथ्वी जल अग्नि वायु और आकाश नामक पाँच महाभूत तत्वों से बना है।  शरीर में जब तक इन पंचतत्वों का संतुलन बना रहता है तब तक मनुष्य मानसिक एवं शारीरिक रूप से स्वस्थ रहता है और पंचतत्वों के संतुलन के बिगड़ते ही व्यक्ति के शरीर में विकार उत्पन्न होने लगते हैं और वह रुग्ण होने लगता है।

वास्तु शास्त्र में सूर्य देव का स्थान बहुत ही प्रतिष्ठित होने के कारण ही वास्तु के दिव्य सिद्धांतों का निर्धारण सूर्य की स्तिथी एवं उसके प्रभाव को देखकर ही किया जाता है।  पूर्व दिशा से उदय होते हुए पृथ्वी पर ताप देकर ऋतुओं का निर्धारण करके पृथ्वी वासियों का कल्याण भी सूर्य देव ही करते हैं।  भवन निर्माण में सूर्य की किरणों के प्रभाव में कोई बाधा ना आए इसलिए सन्फेसिंग भवनों को अधिक मान्यता मिली है।

वैसे तो आप सभी जानते हैं कि वास्तु शास्त्र विश्व के प्राचीनतम शास्त्रों में से एक है।  हजारों वर्ष पूर्व की हडप्पा व मोहनजोदडों की संस्कृतियों में वास्तु विज्ञान स्पष्ट झलकता है।  वास्तु क्या है इसका उल्लेख हमारे प्राचीन ग्रंथों में मिलता है।  मत्स्य पुराण के अनुसार एक समय अन्धकासुर नामक एक राक्षस ने भगवान शिव के अस्तित्व को नकार कर स्वयं को भगवान कहलवाना प्रारम्भ कर दिया।  उसको उसके अन्जाम तक पहुँचाने में भगवान शिव को अत्यन्त परिश्रम करना पड़ा और उसके फलस्वरूप भगवान शिव के शरीर से एक पसीने की बूंद धरती पर गिरी और एक महाभूत उत्पन्न हुआ।

उसके आकार को देखकर सभी देवता भयभीत हो गए और ब्रह्मा जी की शरण में गए।  ब्रह्मा जी के कहे अनुसार देवताओं ने मिलकर उस महाभूत को पकड़ा और आकाश में लेजा कर धरती पर सिर के बल फेंक दिया।  गिरते गिरते महाभूत ने अपने हाथ व पैर आपस में मिला लिए और पृथ्वी में समा गया।  तभी महाभूत ने ब्रह्मा जी की अराधना की और पूछा कि मुझ निरपराध को यह दण्ड क्यों ? मेरा कसूर क्या था ? तब ब्रह्मा जी ने उस महाभूत को वरदान देते हुए कहा कि पृथ्वी वासियों को सुख प्रदान करने के उददेश्य से तुम्हारी उत्पत्ति हुई है।  वास्तुदेव का नाम देते हुए उस महाभूत को ब्रह्मा जी ने कहा कि तुम पृथ्वी पर हर निर्माण के देवता हो।  जो भी मनुष्य तुमसे विमुख होकर कोई निर्माण करेगा वह कभी भी सुखी नहीं रह पाएगा।

विश्व कर्मा प्रकाश नामक प्राचीन ग्रंथ में भी इसका स्पष्ट वर्णन मिलता है कि तब सभी देवताओं और नौग्रहों ने अपनी अपनी शक्ति वास्तु देव को प्रदान की।  नौग्रहों की शक्ति मिलने के कारण ही जब किसी व्यक्ति की ग्रह दशा ठीक नहीं होती तो वह वास्तु दोष वाले भवन में निवास करने लगता है और उसके निकृष्ट फल को भोगता है।  तब वास्तु देव ने ब्रह्मा जी से कहा कि हे प्रभु यदि मेरी उत्पत्ति पृथ्वी वासियों को सुख प्रदान करने हेतू की गई है तो मैं मनुष्य को प्राकृतिक तत्वों पर आधारित पञ्च महाभौतिक तत्वों में संतुलन बनाने की प्रेरणा दूँगा।  तभी से शुद्ध वास्तु के अनुरूप बने भवनों में रहने पर मनुष्य सुख सुविधाओं से संपन्न होता है इसमें कोई अतिशयोक्ति नहीं है।

जब भवन बनकर तैयार हो जाता है तो वह पंचभूत का रूप धारण कर लेता है। ईटो, मिट्टी, सीमेन्ट वगैरह से जब भवन बनकर तैयार हो जाता है तो लोग इसे निर्जीव समझते है लेकिन उनकी यह विचार धारा गलत है। दीवारे भी बाते करती है और सांस लेती है तभी तो कभी कोई गुप्त बात करनी हो तो लोग कहते है कि धीरे बात करें क्योंकि दीवारों के भी कान होते है। इन बातों से सिद्ध होता है कि हमारे पूर्वजों ने इस लकोक्ति को बनाते वक्त वास्तु शास्त्र का अध्ययन किया था। जो भी कर्म हम करते है उसका असर हमारे साथ-साथ, हमारे रहने वाले स्थान पर भी पड़ता है, क्योंकि पंचभूत हर इन्सान की देह(शरीर) मे विद्यमान है।

मनुष्यों एवं बह्याण्ड की रचना पंच महाभूतों के आधार पर हुई है। यह पंचभूत है-पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि एवं वायु। हर स्त्री पुरूष के जीवन मे इनका बहुत महत्व है प्रकृति के विरूद्ध काम करने से इनका सन्तुलन बिगड़ जाता है और हमारी ऊर्जाएं गलत दिशांए अपना लेती है, जिससे अस्वस्थता पैदा होकर हमारे दिमागी व शारीरिक संतुलन को बिगाड़ देती है, और बैचेनी, तनाव अशान्ति इत्यादि को पैदा कर देती है। इसी तरह जब मनुष्य प्रकृति से छेड़छाड करता है तो उसका संन्तुलन बिगड़ जाता है तब तूफान, बाढ़, अग्निकांड तथा भूकम्प आदि अपना तांडव दिखाते हैं।

इसलिए यह जरूरी है कि पंच तत्वों का सन्तुलन बनाए रखा जाए ताकि हम शान्तिपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सके। जैसे कि ऊपर कहा गया है कि भवन निर्माण के बाद यह पंच तत्व गृह मे रहने लगते है, तब यह जरूरी हो जाता है कि इन सबका सही सन्तुलन बना रहे। अगर यह जरा भी बिगड़ जाए तो भवन मे निवास करने वाला मानव सुख-शान्ति से नहीं रह पाएगा। उसे सदैव अशान्ति, कलेश, आर्थिक तंगी, रोग तथा मानसिक द्वंद आदि समस्याएं हमेशा घेरे रहेगी।

स्वास्थ्य, खुशहाली, सुख-चैन के साथ सफल जीवन जीने की प्राथमिकता के अलावा कुदरत में पर्यावरण के संतुलन बनाए रखने की भारतीय संस्कृति सदियों से चली आ रही है। इंसान ने जमीन पर मकान, मंदिर, मूर्तियाँ, किले, महल आदि का निर्माण किया, जिसने धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की जिम्मेदारी का पूरा-पूरा ध्यान रखा। किन्तु इन सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण सूत्र है अंतरिक्ष में हमेशा बने रहने वाले ग्रह नक्षत्र और इस ज्ञान की गंगा को ज्योतिष के नाम से जाना गया।

ब्रह्याण्ड में संचार करती हुई ऊर्जा अर्थात्‌ 'कास्मिक एनर्जी वास्तुशास्त्र में विशेष महत्व है। किसी भी भवन निर्माण आदि के लिए जमीन के सही चुनाव, निर्माण कार्य, इंटीरियर डेकोरेशन आदि कामों में दिशाओं, पाँच महाभूत तत्वों, पृथ्वी, जल, वायु, तेज या अग्नि तथा आकाश विद्युत चुम्बकीय तरंगों, गुरुत्वाकर्षण, कॉस्मिक एनर्जी तथा दिशाओं की डिग्रियों या अंशों का सुनियोजित ढंग से इस्तेमाल वास्तुकला द्वारा किया जाता है।

ज्योतिष का एक हिस्सा जो भवन निर्माण से संबंध रखता है, वास्तुशास्त्र के नाम से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में ब्रह्माण्ड में हमेशा उपस्थित रहने वाली हुई कॉस्मिक ऊर्जा तथा पाँच महाभूत तत्वों का समायोजन वास्तुकला में जिस विद्या द्वारा होता है, वह वास्तुशास्त्र कहलाती है।

मान्यता अधिक होने के कारण हर मनुष्य पूर्व दिशा का भवन ही लेना चाहता है।  दक्षिण दिशा के भवनों के बारे में भ्रामक प्रचार होने की वजह से उन्हें कोई नहीं लेना चाहता हालाँकि दक्षिण दिशा के भवन सर्वथा नुक्सानदायक नहीं होते क्योंकि इस पृथ्वी पर लगभग 25 प्रतिशत से ऊपर भवन दक्षिण व उत्तर दिशा की ओर मुख करके बने हुए हैं, क्या उनमे निवास करने वाले सभी दुखी हैं ? नहीं ऐसा नहीं है, दक्षिण दिशा तब नुक्सान करती है जब शनि व राहू की कराल स्तिथी हो अन्यथा दक्षिण दिशा के भवन शुभ फलदाई भी होते हैं।

ऐसे बहुत से उदाहरण देखने को मिलते हैं जन्मकुंडली में मंगल की अशुभ स्तिथी व शनि से दृष्ट होना भी वास्तु दोष वाले भवन में निवास कराता है।  जीवन में शुभ ग्रहों की दशा के समय मनुष्य अच्छे भवनों में निवास करता है।

अधिकतर वास्तुकला के शौकीन दिशाओं का अंदाज सूर्योदय और सूर्यास्त के आधार पर, मैगनेटिक कम्पास के बिना करते हैं, जबकि इस यंत्र के बिना वास्तु कार्य नहीं करना चाहिए। दिशाओं के सूक्ष्म अंशों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। अतः जरूरी रिनोवेशन या निर्माण कार्य, अच्छे जानकार वास्तुशास्त्री की देखरेख में ही करवाना ठीक होता है।

ज्योतिष का एक हिस्सा जो भवन निर्माण से संबंध रखता है, वास्तुशास्त्र के नाम से जाना जाता है। दूसरे शब्दों में ब्रह्माण्ड में हमेशा उपस्थित रहने वाली हुई कॉस्मिक ऊर्जा तथा पाँच महाभूत तत्वों का समायोजन वास्तुकला में जिस विद्या द्वारा होता है।

प्राचीनतम वास्तु विज्ञान को ज्योतिष एवं धर्म से अलग करके देखना सर्वथा उपयुक्त नहीं है क्योंकि भूमी पर भवन निर्माण से पहले भी हम गणपति पूजन, नौ ग्रह पूजन आदि करते हैं और भवन निर्माण के पश्चात ग्रह प्रवेश के समय भी नौ ग्रह एवं वास्तु सभी देवताओं के पूजन के पश्चात ही ग्रह प्रवेश करते हैं।

वैदिककाल से ही मांगलिक चिन्ह के रूप में जलपूरित एवं आम्रपत्र तथा नारियल से ढका मंगलकलश शुभता, सम्पन्नता एवं समृद्धि का प्रतीक है।  वृहद्संहिता नामक ग्रंथ के अनुसार भूमी का कारक ग्रह मंगल देव हैं।  पूर्व दिशा के स्वामी सूर्य देव हैं।  पश्चिमी दिशा के स्वामी शनि देव हैं, राहू दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व करते हैं।  कुण्डली का चौथा भाग भूमी से सम्बन्ध रखता है।  उत्तम भवन तभी मिलता है जब चौथे भाव का स्वामी केन्द्र या त्रिकोण में होता है या स्थान बलि होता है।

चौथे स्थान पर शुभ दृष्टि का होना व मंगल ग्रह का उत्तम स्तिथी में होना भी अच्छे भवन की प्राप्ति के लिए परमावश्यक माना गया है।  आप सभी जानते हैं की लाल किताब ज्योतिष का एक प्रमाणिक ग्रंथ है।  लाल किताब के अनुसार ग्रहों के शुभ अशुभ फलों का वास्तु से सीधा सम्बन्ध है।  लाल किताब के अनुसार जब सूर्य अष्टम भाव में हो तो दक्षिण दिशा के भवन में निवास नहीं करना चाहिए।  सूर्य देव की अशुभ स्तिथी अगर बारवें भाव में हो तो घर में खुला आँगन ज़रूर बनाएँ।

ब्रहस्पति दूसरे भाव में अगर अशुभ हो तो मकान का कुछ हिस्सा कच्चा ज़रूर रखें अन्यथा गुरु के अशुभ फल का भागी बनना पड़ेगा।  तीसरे भाव में गुरु अशुभ स्तिथी में हो तो घर के पास सुखा पीपल का पेड़ ज़रूर होगा।  दूसरे व चौथे भाव में अगर बुद्ध अशुभ स्तिथी में हो तो घर में मनीप्लांट नहीं लगाना चाहिए।  नौवे भाव में शुभ शनि की स्तिथी मकान में कलेजी पत्थर लगाने पर बहुत फ़ायदा करती है।

ग्यारवे भाव में अशुभ शनि के प्रभाव से दक्षिण दिशा का भवन बहुत नुक्सान देता है।  राहू चौथे भाव में अशुभ हों तो सीडियों के नीचे रसोई नहीं बनानी चाहिए।  लाल किताब की इन प्रमाणिक बातों से यह स्पष्ट प्रतीत होता है कि ज्योतिष का सीधा सम्बन्ध वास्तु शास्त्र के साथ है।  वास्तु शास्त्र को ज्योतिष व ग्रहों से अलग करके नहीं देखा जा सकता।  जिस प्रकार अथर्ववेद का छठा अंग ज्योतिष को माना गया है उसी प्रकार वास्तु को भी ज्योतिष का अंग माना गया है इसलिए एक सफल वास्तु शास्त्री को ज्योतिष का ज्ञान होना परमावश्यक है।

आम धारणा है कि दक्षिण व पश्चिम दिशाएँ अच्छा असर नहीं डालती हैं या अशुभ प्रभाव रखती हैं। मगर सच्चाई कुछ और है। हर एक दिशा में खास अंश होते हैं, जो अच्छा प्रभाव डालते हैं। जैसे 135 से 180 अंश दक्षिण दिशा में, 270 से 310 अंश पश्चिम दिशा में अच्छा प्रभाव रखते हैं। अतः दिशाओं के प्रति पूर्वाग्रह न रखते हुए उनके शुभ अंशा से लाभ उठाने की संभावनाओं का ज्ञान जरूरी है।

दक्षिण पश्चिम दिशा में उत्तर-पूर्व के मुकाबले में खुली जगह कम से कम होनी चाहिए। मुख्य दरवाजा किसी भी दिशा में हो उत्तर-पूर्व वाला भाग दक्षिण-पश्चिम के मुकाबले में खुला, हल्का और साफ-सुथरा होना चाहिए।

दूसरे शब्दों में दक्षिण-पश्चिम वाला हिस्सा ऊँचा, भारी, ज्यादा घिरा हुआ होना चाहिए। साथ ही फर्श की सतह का ढलान इस तरह से नीचा होना चाहिए कि पानी का बहाव दक्षिण से उत्तर या पश्चिम से पूर्व की ओर होना चाहिए। बाउंड्री वॉल भी बिलकुल इसी तरह उत्तर और पूर्व में नीची एवं तुलनात्मक रूप से कम मोटी होनी चाहिए।

उत्तर दिशा पानी संबंधी बातों से ताल्लुक रखती है, इसीलिए उत्तर-पूर्व में जल संबंधी बातों का प्रावधान रखा गया है, कारण सूर्य की चमत्कारी किरणों का भरपूर इस्तेमाल। एक वैदिक ऋचा में कहा गया है। हे सूर्य देवता।

अपनी किरणों द्वारा हमारे हृदय और फेफड़ों के अंदर के कीटाणुओं का नाश करिए। उत्तर-पूर्व दिशा के बड़े खिड़की दरवाजों को और खुली जगह को इसीलिए इतना महत्व दिया गया है कि कॉस्मिक-एनर्जी के साथ अल्ट्रा-वॉयलेट किरणों की संतुलित मात्रा में आवाजाही हो सके। पूर्व दिशा को खास तौर पर एकदम सुबह के उगते हुए सूर्य की अल्ट्रावॉइलेट किरणों के असर की वजह से महत्वपूर्ण बतलाया गया है। हिंदुस्तानी रहन सहन के तौर-तरीकों में इसीलिए ब्रह्ममुहूर्त को इतना महत्व दिया जाता है।

जमीन के नीचे पानी के टैंक, स्विमिंग पूल, कुआँ, बावड़ी, बोरवैल की व्यवस्था का उपरोक्त दिशा में प्रावधान का मुख्य उद्देश्य हाइजीन है। सोने के कमरे का दरवाजा ऐसी जगह पर न बनवाएँ कि बाहर से आते-जाते लोगों की नजर उस कमरे में सोने या आराम करने वालों पर पड़े। ड्राइंग-रूम में सोफज कम बैड का प्रयोग यथासंभव कम से कम करें।

रसोई की सबसे बेहतरीन जगह दक्षिण-पूर्व है, दूसरा विकल्प उत्तर-पश्चिम दिशा में है। अगर दाम्पत्य जीवन के तालमेल में कमी के संकेत मिलते हों तो रसोई तथा शयन कक्ष की वास्तु योजना पर खास तौर पर ध्यान देना चाहिए। रसोई की दीवारों का पेंट आदि का भी ध्यान रखना आवश्यक होता है। रसोई घर में पूजाघर या देवताओं की मूर्ति जैसी चीजें न रखें।

खिड़की, दरवाजे और मुख्य रूप से मेन-गेट पर काला पेंट हो तो परिवार के सदस्यों के व्यवहार में अशिष्टता, गुस्सा, बदजुबानी आदि बढ़ जाते हैं। घर के जिस भी सदस्य की जन्मपत्रिका में वाणी स्थान व संबंधित ग्रह-नक्षत्र शनि, राहु मंगल और केतु आदि से प्रभावित हों, उस पर उक्त प्रभाव विशेष रूप से दृष्टिगोचर होता हो। मंगल व केतु का प्रभाव हो तो लाल पेंट कुतर्क, अधिक बहस, झगड़ालू और व्यंगात्मक भाषा इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति की तरफ इशारा करता है। ऐसे हालात में सफेद रंग का प्रयोग लाभदायक होता है।

रसोई की सबसे बेहतरीन जगह दक्षिण-पूर्व है, दूसरा विकल्प उत्तर-पश्चिम दिशा में है। अगर दाम्पत्य जीवन के तालमेल में कमी के संकेत मिलते हों तो रसोई तथा शयन कक्ष की वास्तु योजना पर खास तौर पर ध्यान देना चाहिए।

अग्नि तत्व या रसोई से संबंध रखने वाली वस्तुओं की सबसे अच्छी व्यवस्था दक्षिण-पूर्व में ही होती है। टेलीविजन, कम्प्यूटर, हीट-कन्वेटर या अन्य ऐसे उपकरण जो एक भवन में सभी या अधिक स्थानों पर हो सकते हैं या ऐसे दूसरे विद्युत उपकरण, जब विभिन्न कमरों में रखने हों तो दिशा ज्ञान प्रत्येक कमरे पर प्रयोग करना चाहिए। उदाहरण के लिए उत्तर-पूर्व में स्थित किसी कमरे में विद्यार्थी के कम्प्यूटर का उचित स्थान उस कमरे के दक्षिण-पूर्व में होगा। इसी तरह रसोई का सबसे बेहतर स्थान दक्षिण-पूर्व में, दूसरा विकल्प उत्तर-पश्चिम दिशा में है, किन्तु रसोई के खर्चों तथा मानसिक चिंताओं में बेवजह वृद्धि हो जाती है। यदि जन्मकालीन ग्रह-नक्षत्र मंगल दोष दाम्पत्य जीवन के असामंजस्य के संकेत देता हो और ऐसे अनुभव भी हो रहे हों तो अन्य कारणों के साथ किचन तथा बैडरूम के वास्तु पर खास तौर पर ध्यान देना चाहिए।

रसोई में कुकिंग रेंज पूर्व में ऐसे रखें कि खाना बनाने वाले के सामने पूर्व दिशा पड़े। फूज्ड प्रोसेसर, माइक्रोवन, फ्रिज इत्यादि की व्यवस्था दक्षिण-पूर्व में होनी चाहिए। पानी संबंधी कार्य जैसे वाटर फिल्टर, डिशवाशर, बर्तन धोने का सिंक आदि उत्तर-पूर्व वाले भाग में होने चाहिए।

पूर्व की दीवार में वॉल कैबिनेट न हों तो बेहतर है यदि जरूरी हो तो यहाँ भारी सामान न रखें। खाने-पीने का सामान उत्तर-पश्चिम दिशा में या रसोईघर के उत्तर-पश्चिम भाग में स्टोर करें जिस दरवाजे से अधिक आना जाना हो या मुख्य द्वार यदि रसोईघर के ठीक सामने हो साथ ही पति पत्नी के ग्रह-नक्षत्र कलह का इशारा देते हैं तो बेहतर होगा कि दरवाजों की जगह बदलवाएँ वरना उक्त परिस्थितियाँ आग में घी का काम करती हैं।

वास्तुशास्त्र में वेध काफी महत्व रखता है। यह बाधा या रूकावट के संकेत देता है। भवन अथवा मुख्य द्वार के सामने अगर पेड़, खंभा, बड़ा पत्थर आदि या जनता द्वारा प्रयोग होने वाले मार्ग का अंत होता है तो उसका विपरीत असर पड़ता है। जब वेध व भवन के बीचों-बीच ऐसी सड़क हो जिसमें आम रास्ता हो तो वेध का प्रभाव पूरी तरह तो नहीं मगर बहुत कुछ कम हो जाता है। घर पर भी किसी कमरे के दरवाजे के सामने कोई वस्तु मसलन जसे सोने के कमरे के सामने ऐसी सजावटी वस्तुएँ तनाव और चिंताओं के कारण या नींद में बाधक हो सकती है।

भवन के बीचों-बीच का हिस्सा ब्रह्म स्थान कहा जाता है। इसे खाली रखा जाना चाहिए। जैसे फर्नीचर या कोई भारी सामान यहाँ पर सेहत व मानसिक शांति को प्रभावित करते हैं। ब्रह्मस्थान वाले क्षेत्र में छत में भारी झाड़ फानूस भी नहीं लटकाएँ जाएँ। इस हिस्से में पानी की निकासी के लिए नालियों की व्यवस्था का निषेध है, यह आर्थिक नुकसान का संकेतक है।

घर, कार्यालय या संस्था के मुखिया आदि के बैठने, काम करने या सोने की जगह दक्षिण-पश्चिम में बहुत अच्छी मानी गई है। ऐसी स्थिति में उनका अपन से छोटे सदस्यों, बच्चों तथा कर्मचारियों, प्रबंधकों आदि पर बेहतर नियंत्रण रहता है। घर पर मेहमान या आफिस में मुलाकात करने वालों के बैठने का इंतजाम कुछ इस तरह होना चाहिए कि उनका मुँह दक्षिण या पश्चिम की ओर होना चाहिए तथा गृहस्वामी या वरिष्ठ अधिकारी उत्तर या पूर्व की ओर मुँह करते हुए बैठें। बच्चे यदि माता-पिता के अनुशासन में न हों और उनके लिए चिंता का कारक हों तो उत्तर-पूर्व दिशा में बच्चों के सोने व पढ़ने की व्यवस्था करें। टेलीफोन, फैक्स का उचित स्थान उत्तर-पूर्व दिशा में है।

एक अच्छे वास्तुशास्त्री को वास्तुशास्त्र के साथ ज्योतिष का ज्ञान होना आवश्यक है। आजकल ज्योतिष और वास्तुशास्त्र एक आकर्षक व्यवसाय के रूप में उभर कर आ रहे हैं। अधकचरे वास्तुशास्त्री अजीबो-गरीब उपाय बतलाते हैं। अतः वास्तुशास्त्री का चुनाव सावधानी से करिए। लोगों की परेशानियों से आनन-फानन छुटकारा दिलवाने का बढ़-चढ़कर दावा करने वालों से हमेशा सावधान रहें।

वास्तुशास्त्र का प्रयोग ज्योतिष को ध्यान में रखते हुए करना अधिक लाभदायक होता है। यह ध्यान रखें कि जीवन सुख-दुःख का मिश्रण है, अतः अंधविश्वास, धर्म, आदि से हटकर इन विधाओं का वैज्ञानिक पक्ष पहचानना सीखें।

आइये देखे क्या होता हें दिशाओ का प्रभाव/असर----

पूर्व-दिशा:—

- पूर्व की दिशा सूर्य प्रधान होती है। सूर्य का महत्व सभी देशो में है।  पूर्व सूर्य के उगने की दिशा है।  सूर्य पूर्व दिशा के स्वामी है।  यही वजह है कि पूर्व दिशा ज्ञान, प्रकाश, आध्यात्म की प्राप्ति में व्यक्ति की मदद करती है।  पूर्व दिशा पिता का स्थान भी होता है।  पूर्व दिशा बंद, दबी, ढकी होने पर गृहस्वामी कष्टों से घिर जाता है।  वास्तु शास्त्र में इन्ही बातो को दृष्टि में रख कर पूर्व दिशा को खुला छोड़ने की सलाह दी गयी है।

दक्षिण-दिशा:—

दक्षिण-दिशा यम की दिशा मानी गयी है।  यम बुराइयों का नाश करने वाला देव है और पापों से छुटकारा दिलाता है।  पितर इसी दिशा में वास करते है।  यह दिशा सुख समृद्धि और अन्न का स्रोत है।  यह दिशा दूषित होने पर गृहस्वामी का विकास रुक जाता है।  दक्षिण दिशा का ग्रह मंगल है। और मंगल एक बहुत ही महत्वपूर्ण ग्रह है।

उत्तर-दिशा:-

यह दिशा मातृ स्थान और कुबेर की दिशा है।  इस दिशा का स्वामी बुध ग्रह है।  उत्तर में खाली स्थान ना होने पर माता को कष्ट आने की संभावना बढ़ जाती है।

दक्षिण-पूर्व की दिशा:—

इस दिशा के अधिपति अग्नि देवता है।  अग्निदेव व्यक्ति के व्यक्तित्व को तेजस्वी, सुंदर और आकर्षक बनाते है।  जीवन में सभी सुख प्रदान करते है। जीवन में खुशी और स्वास्थ्य के लिए इस दिशा में ही आग, भोजन पकाने तथा भोजन से सम्बंधित कार्य करना चाहिए।  इस दिशा के अधिष्ठाता शुक्र ग्रह है।

उत्तर-पूर्व दिशा:-

यह सोम और शिव का स्थान होता है।  यह दिशा धन, स्वास्थ्य औए एश्वर्य देने वाली है।  यह दिशा वंश में वृद्धि कर उसे स्थायित्व प्रदान करती है।  यह दिशा पुरुष व पुत्र संतान को भी उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करती है।  और धन प्राप्ति का स्रोत है।  इसकी पवित्रता का हमेशा ध्यान रखना चाहिए।

दक्षिण-पश्चिम दिशा:—

यह दिशा मृत्यु की है।  यहां पिशाच का वास होता है।  इस दिशा का ग्रह राहू है।  इस दिशा में दोष होने पर परिवार में असमय मौत की आशंका बनी रहती है।

उत्तर-पश्चिम दिशा:—

यह वायुदेव की दिशा है।  वायुदेव शक्ति, प्राण, स्वास्थ्य प्रदान करते है।  यह दिशा मित्रता और शत्रुता का आधार है।  इस दिशा का स्वामी ग्रह चंद्रमा है।

पश्चिम-दिशा:-

यह वरुण का स्थान है।  सफलता, यश और भव्यता का आधार यह दिशा है।  इस दिशा के ग्रह शनि है।  लक्ष्मी से सम्बंधित पूजा पश्चिम की तरफ मुंह करके भी की जाती है।

इस प्रकार सभी दिशाओं के स्वामी अलग अलग ग्रह होते है और उनका जीवन में अलग अलग प्रभाव उनकी स्थिति के अनुसार मनुष्य के जीवन में पडता रहता है।

अब जानते हें की क्या प्रभाव/असर होता हें पाँच तत्वों का ?

इन पंच तत्वों को जानने के लिए हमें इनके बारे मे अलग-अलग समझना होगा कि यह क्या है और इनका मनुष्य व ब्रह्याण्ड पर किस प्रकार असर पड़ता है। पंच तत्वों का संक्षेप से वर्णन इस प्रकार है।

1 .पृथ्वी--

पृथ्वी सौरमण्डल के नवग्रहों मे से एक है। सूर्य के अंश से टूटकर यह लाखों वर्ष पूर्व उसका प्रादुर्भाव हुआ था। कहते है कि अन्य ग्रह भी इसी प्रकार उत्पन्न हुए थे। सूर्य से टूटने के बाद यह उसके इर्द-र्गिद चक्कर काटने लगे और धीरे-धीरे यह सूर्य से दूर हो गए। इसी प्रकार पृथ्वी भी सूर्य से दूर हो गई और धीरे-धीरे ठंडी हो गई। पृथ्वी पर लम्बे समय तक रसायनिक क्रियाओ के फलस्वरूप प्राकृतिक स्थलों, पर्वतों, नदियों व मैदानों आदि का जन्म हुआ। पृथ्वी सूर्य के गिर्द चक्कर काटने के साथ-साथ अपनी धुरी पर भी 23 डिग्री मे घूम रही हैं।

यहां पानी, गुरूत्वाकर्षण शक्ति तथा दक्षिणोत्तर धु्रवीय तरंगे पृथ्वी की सभी जीव-निर्जीव वस्तुओं को प्रभावित करती है। पृथ्वी ही जीवनदायिनी है और पालनहार है। पृथ्वी की इसी ममतामयी छवि के कारण भवन निर्माण का कार्य इस पर होता है, क्योंकि भूमि के बिना भवन निर्माण नही हो सकता। कहने का तात्पर्य कि भवन निर्माण कार्य मे भूमि के महत्व को अनदेखा नही किया जा सकता तभी तो भारतीय प्राचीन ग्रन्थों मे पृथ्वी की महत्ता को ‘माता’ जैसे शब्दो से सम्बोधित किया गया है और भूमि पर किसी भी कार्य को प्रारम्भ करने से पूर्व पूजा का विधान रखा गया है।

2. जल--

जल ही जीवन है इसमे मे कितनी सच्चाई है इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि किसी सजीव या निर्जीव वस्तु का अस्तित्व ‘जल’ के बिना नही रह सकता और वह जल्द समाप्त हो जाती है। जीवन का कारण ही जलचक्र है। सागर, नदियों, नहरों, तालाबो इत्यादि का जल वाष्प बनकर आकाश मे चला जाता है और बादल के रूप मे आकर वर्षा बनकर जल के रूप में फिर से धरती पर आ जाता है।

इसी से जीवन कायम है। यह तो विज्ञान भी मानता है कि जल मे एक अंश प्राणवायु (ऑक्सीजन) का भी होता है जोकि इन्सान के खून मे मिलकर नसो मे दौड़ता है और उसे जीवन देता है। जल तीन रूपों मे मिलता है जैसे ठोस (वर्षा) तरल व गैस (भाप एवं बादल)। आम तौर पर जल व अग्नि की जरूरत पड़ती है। यह पांचो महाभूत अलग अलग हो तो यह किसी काम के नही और अगर इन्हे एक रूप कर दिया जाए तो जीवन की एक अनुपम रचना बन सकती है।

इतिहाकारों का मानना है कि विश्व की महान सभ्यताएं जल के किनारे ही पली-बढ़ी व जल का ही ग्रास बन गई। अतः पृथ्वी के संचालन के लिए जल अत्यंत महत्वपूर्ण है। वास्तुशास्त्र के मुताबिक जल को मुख्य तत्व में रखा जाना चाहिए और निर्माण सामग्री मे इसके सन्तुलन को ध्यान मे रखना जरूरी है।

3. अग्नि----

अग्नि व तेल यह ऊर्जा के स्त्रोत हे और बिना ऊर्जा के जीवन का कोई आधार नही है। ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत सूर्य है जिसके तेज से ही जीवन प्रकाशमान है। तेज को किसी भी मनुष्य के असाधारण गुण के रूप मे देखा जाता है। पर्यावरण मे व्याप्त वायुकण, धूल और बादल अपनी चुम्बकीय शक्ति के कारण एक दूसरे की ओर आकर्षित होते रहते है। इसी कारण इनके सिमटने और फैलने की क्रिया होती है जिसके बल से ऊर्जा पैदा होती है और यही ऊर्जा अग्नि है।

अग्नि का मनुष्य की रोजमर्रा की जिन्दगी मे बहुत महत्व है जैसे भोजन इत्यादि पचाना व प्रकाश करना। हिन्दु संस्कृति के अनुसार धार्मिक कार्यक्रम मे भी अग्नि का बहुत महत्व है। जैसे यज्ञ, हवन, विवाह, संस्कार व अन्य कर्मकांड अग्नि के बिना अधूरे गिने जाते है। अग्नि को प्रचण्ड रूप मे भी देखा जा सकता है। जब यह देखते ही देखते बड़े-बड़े महलों व ऊंचे-ऊंचे भवनों को धूल मे मिला देती है। भारतीय शास्त्रो मे कहा गया है कि अग्नि मनुष्य के साथ जन्म से लेकर मरण तक रहती है और यह चिरन्तन सत्य है। अग्नि सत्य एवं अविनाशी है और मनुष्य जीवन के हरएक पहलू से जुड़ी है। इसे वास्तु मे भी बहुत महत्व दिया गया है।

5. वायु----

चलते फिरते मनुष्य के जीवन मे वायु का बहुत महत्व है, जो कि श्वसन क्रिया से सम्बन्धित है। जब यह सम्बन्ध विच्छेद हो जाता है तो मनुष्य का जीवन समाप्त हो जाता है। प्राणी ही नही पेड़ पौधे भी वायु के बिना क्षीण होकर समाप्त हो जाते है। मतलब यह कि वायु का संतुलन सृष्टि की रचना व स्थायित्व मे योगदान बहुत महत्वपूर्ण है। पृथ्वी पर वायु मण्डल का दायरा लगभग 400 कि. मी. है, जिसमें विभिन्न प्रकार की गैसों का मिश्रण है।

मनुष्य जीवन के लिए दो गैसों आक्सीजन और हाईड्रोजन का बहुत महत्व है क्योंकि यही दोनो गैसें जल का कारक है और उससे मनुष्य का शरीर संचालित है। अगर इसमे कमी आ जाए तो मनुष्य को चमड़ी व खून के दबाव इत्यादि रोगों का सामना करना पड़ सकता है। मनुष्य की प्रत्येक क्रिया मे कहीं न कहीं पंच महाभूतों का सम्मिश्रण अवश्य पाया जाता है। यह मिश्रण किसी और ग्रह पर नही है तभी तो वहां जीवन संभव नही हो पाया है। वस्तुतः वायु मानव के लिए अन्य शक्तियों का अमूल्य उपहार है। वास्तु द्वारा वायु को इतनी पहल इसलिए दी गई है कि यह निर्माण कार्य को बहुत हद तक प्रभावित करती है।

.5. आकाश---

आकाश अनन्त असीम व अथाह है। यह ऊर्जा की तीव्रता, प्रकाश लौकिक किरणों, विद्युतीय व चुम्बकीय शक्तियों का प्रतीक है। यह अपने अन्दर एक आकाश गंगा नहीं बल्कि असीम आकाश गंगाए समाएं हुए हैं, जिनमें हमारे सूर्य जैसे सैकड़ों सूर्य चमक रहे है। सभी ग्रह-उपग्रह अपनी स्थिति एवं समयानुसार इसमे परिक्रमा कर रहे है। हमारे जीवन मे समृद्धि व आनन्द लाने मे आकाश का महत्वपूर्ण स्थान है।

यदि इन्सान अपनी जिन्दगी मे सुख, समृद्धि व आनन्द पाना चाहता है तो उसे पंच महाभूतों को यथोचित सम्मान देना चाहिए ताकि वह अपने जीवन मे अरोग्यता, शान्ति, समृद्धि व उन्नति प्राप्त कर सके।

पंच भूतों का गृह में स्थानः- जैसा कि आपको पहले बताया है कि सारा ब्रह्माण्ड पंच तत्वों से बना हुआ है और वैसे ही इन पंच तत्वों का भवन में कहां पर निवास है यह नीचे बताया गया है।

 

1. जलः- जल का स्थान उत्तर पूर्व दिशा मे बताया गया है। जल का भूमिगत भण्डारण, कुआं इत्यादि पूर्व उत्तर दिशा में होना चाहिए ताकि सूर्य की सुबह की किरणे इस पर पड़े और द्घातक कीटाणु नष्ट हो जाएं। इस तरफ जल का भण्डार होने से गृह स्वामी को खुशी व समृद्धि प्राप्त होती है।

2. अग्निः- अग्नि का स्थान दक्षिण पूर्व मे है। इसलिए रसोई का स्थान इस दिशा में होना चाहिए। अग्नि को जलाते समय मनुष्य का मुख पूर्व दिशा में होना चाहिए। इससे द्घर में खुशी व समद्धि रहती है और मनुष्य का मन शान्त रहता है।

3. भूमिः- भवन के दक्षिण पश्चिम भाग को सख्त माना गया है इसलिए इस दिशा को भूमि की संज्ञा दी गई है। कहते हैं कि यह दिशा जितनी ऊंची होगी गृह स्वामी का उतना ही अधिक मान सम्मान होगा और वह समाज मे बहुत ऊंचा दर्जा प्राप्त करता है।

4. वायुः- वायु का स्थान उत्तर-पश्चिम में माना गया है। इसलिए भवन के दरवाजे, खिडकियां इत्यादि इसी दिशा में बनवाने की सलाह दी जाती है। ताकि द्घर में पर्याप्त वायु प्रवेश करें और द्घर में रहने वालों को पूर्ण रूप से वायु मिले। अगर इस दिशा में वायु का प्रवाह बिना रूकावट मिले तो ऐसे भवन के स्वामी को हमेशा खुशी मिलेगी और व्यापार मे तरक्की एवं अच्छे मित्र मिलेंगें जो सुख दुख के साथी होगें।

5. आकाशः- आकाश का सम्बन्ध भवन के बीच के स्थान को दिया जाता है। भवन निर्माण करते समय बीच वाले स्थान को खाली छोड़ देना चाहिए। इसे बहा स्थान भी कहा जाता है। यह स्थान आकाश से सीधा दिखाई देना चाहिए। इसके बीच मे बीम इत्यादि या रूकावट नहीं होनी चाहिए। छोटे भवनों वाले इस तरह का स्थान नही बना सकते परन्तु उन्हें कोशिश करनी चाहिए कि भवन के बीच का स्थान खाली रहे चाहे तो समतल ही रहनें दे। कोई भी भारी सामान बना रहता है और धर्म कर्म के अभिरूचि बनी रहती है।

ज्योतिष एवं वास्तु में दिशाओ का महत्त्व---

वास्तु के अनुसार दिशाओं का भी भवन निर्माण मे उतना ही महत्व है जितना कि पंच तत्वों का है। दिशांए कौन-कौन सी है और उनके स्वामी कौन-कौन से है यह नीचे दिए जा रहे हैं। कहते हैं कि दिशा व्यक्ति की दशा बदल देती है। यह बात वास्तुनुरूप बने भवन पर पूर्ण रूप से सत्य साबित होती है। यदि किसी भवन निर्माण का दिशाओं के बिना ध्यान रखे निर्माण किया जाए तो ऐसे भवन के स्वामी को अनेक कष्ट, दुखो का सामना करना पड़ता है। हमें वस्तुतः चार दिशााओं का ज्ञान है जिस ओर से सूर्य उदय होता है उस ओर पूर्व व जिस दिशा मे सूर्य अस्त होता है उसे पश्चिम कहा जाता है। अगर पूर्व की ओर मुंह करके खड़े हो जाए तो बायीं ओर उत्तर व दाहिनी ओर दक्षिण दिशा होती है।

वास्तु विज्ञान/शास्त्रों के अनुसार चार दिशाओं के अतिरिक्त चार उपदिशाएं या विदिशाए भी होती है और यह चार है 1. ईशान 2. आग्नेय 3. नैऋत्य 4. वायव्य.

इन विदिशाओं का भी वस्तु शास्त्र मे बहुत महत्व है समरागण सूत्र में दिशाओं/विदिशाओं का उल्लेख इस प्रकार किया गया है।

1. पूर्वः- यह तो सभी जानते है कि सूर्य पूर्व दिशा में निकलता है और सुबह की किरणों मे जीवनदायी पोषक तत्व होते है, जिनकी शरीर व वनस्पति को बहुत आवश्यकता होती है। इस दिशा का स्वामी ‘इन्द्र’ हैं और इसे सूर्य का निवास स्थान भी माना जाता है। अतः एवं यह स्थान मुख्यतः प्रमुख व्यक्ति या पितृ स्थान माना जाता है अतः एवं इस दिशा को खुला व स्वच्छ रखा जाना चाहिए। इस दिशा मे कोई रूकावट नहीं होनी चाहिए। यह दिशा वंश वृद्धि मे भी सहायक होती है। यह दिशा अगर दूषित होगी तो व्यक्ति के मान सम्मान को हानि मिलती है व पितृ दोष लगता है।

पूर्व दिशा का स्वामी ‘इन्द्र है। यह कालपुरूष है। प्रयास करें कि इस दिशा मे टायलेट न हो वरना धन व संतान की हानि का भय रहता है। पूर्व दिशा में बनी चारदीवारी पश्चिम दिशा की चार दीवारी से ऊंची न हो, वरना संतान हानि का भय है इस दिशा का प्रतिनिधी ग्रह सूर्य है।

 

2.पश्चिमः- जब सूर्य अस्तांचल की ओर होता है तो वह दिशा पश्चिम कहलाती है। इस दिशा का स्वामी ‘वरूण’ है और यह दिशा वायु तत्व को प्रभावित करती है और वायु चंचल होती है। अतः यह दिशा चंचलता प्रदान करती है। यदि भवन का दरवाजा पश्चिम मुखी है तो वहां रहने वाले प्राणियों का मन चंचल होगा। पश्चिम दिशा सफलता यश, भव्यता और कीर्ति प्रदान करती है।

पश्चिम दिशा का स्वामी ‘वरूण’ है और इसका प्रतिनिधि ग्रह ‘शनि’ है। यदि ऐसे गृह का मुख्य द्वार पश्चिम दिशा वाला हो तो गलत है। इस कारण ग्रह स्वामी की आमदनी ठीक नहीं होगी उसे गुप्तांग की बीमारी होगी।

3. उत्तरः- सूर्य के निकलते समय अगर उस ओर मुंह करके खड़े हो जाए तो हमारी बायीं तरफ की दिशा उत्तर दिशा कहलाती है या इसे ऐसे भी ज्ञात किया जा सकता है कि जिस ओर ध्रुव तारा है, वह दिशा उत्तर दिशा भी कहलाती है। इस दिशा का स्वामी ‘कुबेर’ है और यह दिशा जल तत्व को प्रभावित करती है। भवन निर्माण करते समय इस दिशा को खुला छोड़ देना चाहिए। अगर इस दिशा में निर्माण करना जरूरी हो तो इस दिशा का निर्माण अन्य दिशाओं की अपेक्षा थोड़ा नीचा होना चाहिए। यह दिशा सुख सम्पति, धन धान्य एवं जीवन मे सभी सुखों को प्रदान करती है। उत्तर मुखी भवन इसकी दिशा का ग्रह ‘बुध’ है।

उत्तरी हिस्से में खाली जगह ने हो अहाते की सीमा के साथ सटकर और मकान हो और दक्षिण दिशा मे जगह खाली हो तो वह भवन दूसरो की सम्पति बन सकता है।

4.दक्षिणः- चढ़ते सूर्य की ओर मुंह करके खड़े होने से अगर बायीं ओर उत्तर हो तो निश्चित दायीं ओर दक्षिण दिशा होनी चाहिए। आम तौर पर दक्षिण दिशा को अच्छा नहीं मानते क्योंकि दक्षिण दिशा का यम का स्थान माना जाता है और यम मृत्यु के देवता है अतः आम लोग इसे मृत्यु तुल्य दिशा मानते है। परन्तु यह दिशा बहुत ही सौभाग्यशाली है। यह धैर्य व स्थिरता की प्रतीक है। यह दिशा हर प्रकार की बुराइयों को नष्ट करती है। दक्षिण भारत में तिरूपति मन्दिर बहुत प्रसिद्ध है दक्षिण दिशा मे स्थित होते हुए भी यह मन्दिर बहुत समृद्धशाली एवं प्रसिद्ध है। इस मन्दिर की आय से दक्षिण भारत में कई शिक्षा संस्थान एवं अनाथालय चलते है जिस कारण यह बहुत प्रसिद्ध है। अतः दक्षिण दिशा उतनी बुरी भी नही है जितनी कि लोगो की धारणा है। भवन निर्माण करते समय पहले दक्षिण भाग को कवर करना चाहिए और इस दिशा को सर्वप्रथम पूरा बन्द रखना चाहिए। यहां पर भारी समान व भवन निर्माण साम्रगी को रखना चाहिए। यह दिशा अगर दूषित या खुली होगी तो शत्रु भय का रोग प्रदान करने वाले होगी। इस दिशा का स्वामी यम है और ग्रह मंगल है।

5. ईशानः- पूर्व दिशा व उत्तर दिशा के मध्य भाग को ईशान दिशा कहा जाता है ईशान दिशा को देवताओं का स्थान भी कहा जाता है। इसीलिए हिन्दू मान्यता के अनुसार कोई शुभ कार्य किया जाता है तो द्घट स्थापना ईशान दिशा की ओर की जाती है। सूर्योदय की पहली किरणे भवन के जिस भाग पर पड़े उसे ईशान दिशा कहा जाता है। यह दिशा विवेक, धैर्य, ज्ञान, बुद्धि आदि प्रदान करती है भवन मे इस दिशा को पूरी तरह शुद्ध व पवित्र रखा जाना चाहिए। यदि यह दिशा दूषित होगी तो भवन मे प्रायः कलह व विभिन्न कष्टों को प्रदान करने के साथ व्यक्ति की बुद्धि भ्रष्ट होती है और प्रायः कन्या संतान प्राप्त होती है। अतः भवन में इस दिशा का विशेष ध्यान रखना चाहिए। इस दिशा का स्वामी ‘रूद्र’ यानि भगवान शिव है और प्रतिनिधि ग्रह ‘बृहस्पति’ है।

6. आग्नेयः- पूर्व दिशा व दक्षिण दिशा को मिलाने वाले कोण को अग्नेय कोण संज्ञा दी जाती है। जैसा कि नाम से ही प्रतीत होता है। इस कोण को अग्नि तत्व का प्रभुत्व माना गया है और इसका सीधा सम्बन्ध स्वास्थय के साथ है। यदि भवन की यह दिशा दूषित रहेंगी तो द्घर का कोई न कोई सदस्य बीमार रहेगा। इस दिशा के दोषपूर्ण रहने से व्यक्ति को क्रोधित स्वभाव वाला व चिडचिड़ा बना देगा। यदि भवन का यह कोण बढ़ा हुआ है तो यह संतान को कष्टप्रद होकर राजमय आदि देता है। इस दिशा का स्वामी ‘गणेश’ है और प्रतिनिधि ग्रह ‘शुक्र’ है। यदि आग्नेय ब्लॉक की पूर्वी दिशा मे सड़क सीधे उत्तर की ओर न बढ़कर घर के पास ही समाप्त हो जाए तो वह घर पराधीन हो जाएगा।

7. नैऋत्यः- दक्षिण व पश्चिम के मध्य कोण को नेऋत्य कोण कहते है। यह कोण व्यक्ति के चरित्र का परिचय देता है। यदि भवन का यह कोण दूषित होगा तो उस भवन के सदस्यों का चरित्र प्रायः कुलषित होगा और शत्रु भय बना रहेगा। विद्वानों के अनुसार इस कोण के दूषित होने से अकस्मिक दुर्द्घटना होने के साथ ही अल्प आयु होने का भी योग होता है। यदि द्घर में इस कोण में खाली जगह है गड्डा है, भूत है या कांटेदार वृक्ष है तो गृह स्वामी बीमार, शत्रुओं से पीडित एंव सम्पन्नता से दूर रहेगा। नेऋत्य का हर कोण पूरे घर मे हर जगह संतुलित होना चाहिए, अन्यथा दुष्परिणाम भुगतना पड़ेगा। इस दिशा का स्वामी ‘राक्षस’ है और प्रतिनिधि ग्रह ‘राहु’ है।

8. वायव्यः- पश्चिम दिशा व उत्तर दिशा को मिलाने वाली विदिशा को वायव्य विदिशा या कोण कहते है जैसा कि नाम से ही विदित होता है कि यह कोण वायु का प्रतिनिधित्व करता है। यह वायु का ही स्थान माना जाता है। यह मानव को शांति, स्वस्थ दीर्घायु आदि प्रदान करता है। वस्तुतः यह परिवर्तन प्रदान करता है। भवन मे यदि इस कोण मे दोष हो, तो यह शत्रुता चपट हो तो, जातक भाग्यशाली होते हुए भी आनन्द नही भोग सकता है। यदि वायव्य द्घर मे सबसे बड़ा या ज्यादा गोलाकार है तो गृहस्वामी को गुप्त रोग सताएंगें। इस कोण का स्वामी ‘बटुक’ है और प्रतिनिधि ग्रह ‘चन्द्रमा’ माना गया है।

हम अपने पढ़ने वाले के ज्ञान के लिए बता दे कि पूजा स्थल पर मूर्तिया स्थापित करते समय उनका मुख किस किस दिशा में होना चाहिए। पूजा के लिये जैसा हमने पहले लिखा कि इशान कोण सर्वाधिक उत्तम माना गया है। क्योंकि उत्तर व पूर्व से आने वाली ऊर्जा मन व मस्तिष्क को एकाग्रचित रखती है जो कि पूजा पाठ के लिए बहुत जरूरी है। इसी प्रकार चित्र, मूर्ति या प्रतिमा का भी मुख दिशा विशेष की ओर रखने का अपना महत्व है।

ब्रह्मा, विष्णु, शिव, कार्तिकेय, इन्द्र इत्यादि की मूर्तियों या चित्रों का मुख, पूर्व या पश्चिम की ओर रखना चाहिए। गणेश, कुबेर, षेडसी मातृकाओं का मुख सदैव दक्षिण दिशा की ओर होना चाहिए व हनुमान जी की मूर्ति या चित्र का मुख सर्वदा नैऋत्य दिशा की ओर होना चाहिए। इन सभी दिशाओं की ओर मुख निर्धारित करने के पीछे कुछ वैज्ञानिक तथ्य है ऐसा वास्तु शास्त्र का मानना है। यदि पूजा इत्यादि इशान दिशा में होगी तो उत्तर से बहने वाली चुम्बकीय तरंगे मानव के मन मस्तिक को एकाग्रचित रखती है और इसी से गति मिलेगी जो ध्यान व आत्मिक शांति के लिए बहुत जरूरी है।

वास्तु का मानव जीवन से सम्बन्धः----

जिस प्रकार आज के युग में ज्योतिष मानव जीवन मे अपना स्थान स्थापित कर चुका है, उसी प्रकार आज के समय में वास्तु शास्त्र भी मानव जीवन मे महत्वपूर्ण स्थान ग्रहण कर चुका है। क्योंकि मानव जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नही है जो वास्तु शास्त्र से प्रभावित न हो। यह तो अब माना जाने लगा है कि मकान की बनावट, उसमें रखी जाने वाली चीजें और उन्हे रखने का तरीका जीवन को बना व बिगाड़ सकता है।

कुछ समय पहले वास्तु शास्त्र का उपयोग सिर्फ धनाढ़्‌य व्यक्ति अपनी फैक्टरियों व कोठियां आदि बनवाने में करते थे, परन्तु आज एक साधारण व्यक्ति भी इस बारे में जानकारी रखता है और उसकी कोशिश रहती है कि वह अपना भवन वास्तु शास्त्र की दिशा निर्देश के अनुसार करवाए, ताकि भविष्य मे आने वाले दुःख तकलीफ का निवारण कर सके। वास्तु शास्त्र के सिद्धान्तों मे प्रकृति के साथ तालमेल बढ़ाने के कई तरह के उदाहरण मिलते है। वास्तु शास्त्र की यह कोशिश रहती है कि प्रकृति के नियमों के खिलाफ कोई काम न करे ताकि किसी प्रकार का कोई दण्ड न मिलें।

वास्तु का एक उत्तम प्रमाण अमेरिका के भूतपूर्व राष्ट्रपति श्री बिल क्लिंटन है जो कि वास्तु शास्त्र का लोहा मानते हैं। अपने कार्यकाल मे उन्होने अपने ऑफिस में बैठने की दिशा बदल कर और अपने आवास को उत्तर दिशा वाली खिड़की में मोमबत्ती जला कर रखने से अपनी जीवन में सुखद अनुभूति महसूस की। इससे सिद्ध होता है कि वास्तु शास्त्र का प्रचलन पश्चिमी देशों में भी है तभी तो वहां के लोग सुख व शान्ति से रहते है। वास्तु का मनुष्य की राशी में ग्रहों से भी बहुत निकट का सम्बन्ध है। इसका विवरण हम नीचे अलग से दे रहे हैं।

वास्तु का ग्रहों से सम्बन्धः-

जैसा कि हम पहले भी लिख चुके है कि वास्तु और ज्योतिष का चोली दामन का सम्बंध है इसमें कुछ भी झूठ नहीं है, क्योंकि ग्रहों का प्रभाव भवन निर्माण पर पड़ता है। जिस तरह मानव जीवन पर शुभ और अशुभ ग्रहों का प्रभाव पड़ता है, ऐसा ही प्रभाव निर्जीव वस्तुओं पर भी पड़ता है। उदाहरण के लिए जिस प्रकार चन्द्रमा के बढ़ने व घटने का प्रभाव समुद्र पर पड़ता है और इसी प्रभाव के कारण ज्वार भाटा उठता है। इससे सिद्ध होता है कि वास्तु जैसी निर्जीव वस्तुओं पर भी ग्रहो का प्रभाव पड़ता है और वह इन ग्रहों के प्रभाव से नही बच सकती।

इस का उदाहरण इस प्रकार भी समझा जा सकता है कि एक ही जगह पर दो पत्थर पड़े हुए हैं और जिस पर ग्रहों का शुभ प्रभाव है वह देवता की मूर्ति के लिए चुन लिया जाता है, परन्तु बुरे ग्रह के प्रभाव के कारण दूसरे पत्थर को सीढ़ियों के लिए भी जगह नही मिलती। इन दो उदाहरणों से यह सिद्ध होता है कि ग्रहों का प्रभाव निर्जीव वस्तुओं पर भी उसी प्रकार पड़ता है जिस प्रकार मानव जीवन पर पड़ता है।

जैसा कि हम पहले लिख चुके है कि वास्तु एवं ज्योतिष के अनुसार आठ दिशाएं है और हर दिशा एक निश्चित ग्रह के अधीन होती है और उनका दिशाओं पर एक विशेष प्रकार का प्रभाव रहता है। कौन-कौन सी दिशा में किस-किस ग्रह का प्रभाव विशेष रूप से पड़ता है यह हम निम्नलिखित सारिणी द्वारा बता रहे है।

ग्रहों के द्वारा द्घर के मालिक व परिवार के सदस्यों पर पड़ने वाले प्रभाव का विवरण इस प्रकार है।

1. सूर्यः- सूर्य क्योंकि पूर्व दिशा से निकलता है, इसीलिए उसका आधिपत्य इस दिशा में रहता है। जिस भवन का मुख्य प्रवेश द्वार पूर्व की आरे होगा उस भवन में रहने वाले लोग श्रेष्ठ व्यक्तित्व वाले, ओजस्वी एवं समृद्ध होंगें। ऐसे लोंगों की वृद्धि अति तेज होगी और उनका लग्न सिंह होता है। ऐसे व्यक्तियों को कड़वी चीजे बहुत पसन्द होती है। अतः वह मेथी, करेला आदि सब्जियों के बहुत शौकीन होते है।

2. चन्द्रः- चन्द्र का स्वामित्व भवन के वायव्य दिशा में होता है। क्योंकि वायु कभी भी एक जगह नही ठहरती है, इसलिए जिस भवन का द्वार इस दिशा में होगा उस गृह का स्वामी व गृह में रहने वाले लोगों का स्वभाव चंचल, अस्थिर तथा भावावेश में बहने वाला होगा। ऐसे लोग सैर सपाटे, यात्रा व मौजमस्ती के शौकीन होते है। हरी सब्जियां उन्हे बहुत पसन्द होती है और नमकीन के बहुत शौकीन होते है।

3. मंगलः- मंगल उस भवन का स्वामी होता है जिसका द्वार दक्षिण दिशा मे हों। इस ग्रह का स्वामी कर्मनिष्ट, साहसी निडर एवं निर्भीक होता है। वह स्वभाव से कुछ चंचल भी होता है। ऐसे व्यक्तियों की पंसद गरिष्ट व मसालेदार भोजन होता है।

4.बुधः- जिस भवन का प्रवेशद्वार उत्तर दिशा मे होता है उसका स्वामी बुध को माना जाता है। बुद्ध अपने प्रभाव द्वारा ग्रह स्वामी को बुद्धिचातृर्य एवं विनोद प्रदान करता है, जिस कारण मानव अपने बुद्धिबल पर प्रसिद्धि पाता है और उसका कार्य क्षेत्र लेखन एवं साहित्य से जुड़ा होता है। ऐसे लोग नियमों एवं अनुशासन का बहुत सख्ती से पालन करते है। वह किसी भी भोजन को प्राथमिकता नहीं देते। उन्हे जो मिल पाता है उसी को संतोषपूर्वक ग्रहण कर लेते है।

5. गुरू(बुहस्पति):- गुरू या बुहस्पति अपना आधिपत्य उस भवन पर जमाते है जिस भवन का मुख्य द्वार ईशान दिशा में होता है। ऐसे भवन के गृहस्वामी का स्वभाव दयालु, धार्मिक व विचारशील प्रकृति का होता है। ऐसे पुरूष धर्म के प्रति बहुत आस्था रखते हैं। जरूरत पड़ने पर वह साहस का संचार भी कर लेते है और दुश्मन से लोहा लेने को तैयार रहते हैं। अध्ययन, अध्यापन, भाषा एवं शिक्षा के क्षेत्रों मे खास रूचि होती है। ऐसे लोग सात्विक एवं शुद्ध भोजन को ही ग्रहण करते है।

6.शुक्रः- जिन भवनों का प्रवेश द्वार आग्नेय दिशा की ओर हो ऐसे गृहों का आधिपत्य ग्रह शुक्र होगा। क्योंकि शुक्र का प्रभाव मौज मस्ती व विलास का प्रतिनिधित्व करता है। अतः ऐसे गृहस्वामी विलासी व मौजमस्ती करने वाले होगे। ऐसे व्यक्ति कठिन दौर मे भी अपने मनोरंजन के लिए पर्याप्त समय निकाल लेते है और अपनी आमदनी का ज्यादा हिस्सा ऐसे कार्यो पर व्यय करते है। वे स्वभावतः कला प्रेमी होते है एवं रसिक प्रवृति के होने के कारण इनका पहनावा तड़क भड़क वाला होता है। सुन्दर दिखने के लिए ऐसे मानव अनेक उपक्रम करते है। इन लोगो की पसन्द दही, पनीर, एवं खट्टे पदार्थ होते है।

7. शनिः- शनि ग्रह स्वभाव से कठोर एवं गंभीर माने जाते है। अतः एव ऐसे भवन जिनका मुख पश्मिच दिशा में होता है और मुख्य द्वार भी इसी दिशा में हो तो उसका स्वामी शनि को माना गया है। इस ग्रह के प्रभाव से गृहस्वामी ठहराव, गंभीरता से विचार करते है और नफे नुकसान को ध्यान मे रखकर कार्य करते है। अपने मिलने जुलने वालो मे ऐसे लोगों की छवि गंभीर व्यक्ति वाली बन जाती है। ऐसे लोग गरिष्ट, तले पदार्थो व ठंडे पेयजल के अधिक शौकीन होते है।

8. राहुः- राहु का आधिपत्य नैऋत्य दिशा मे होता है और जिस भवन का मुख्य द्वार इस दिशा मे हो तो इस ग्रह का उस पर पूर्ण प्रभाव होगा। राहु क्योंकि तामसी प्रवृति का माना गया है अतः एव ऐसे भवन का गृहस्वामी मूलतः तामसिक, द्घमण्डी, लुच्चा एवं धूर्त होगा। गुस्सा करना उसकी दिनचर्या का एक हिस्सा बन जाता है। मांस, मछली, गरिष्ट एवं बासी भोजन इनकी प्रथम पसन्द होती है।

कोई ग्रह विशेष अपना प्रभाव किस प्रकार रखता है यह उपरोक्त व्याख्या से स्पष्ट हो जाता है। कई लोगों के मन में भ्रम उठता है कि अगर किसी भवन के एक से अधिक प्रवेश द्वार भिन्न-भिन्न दिशाओं मे हो तो उस पर किस ग्रह का प्रभाव होगा। ऐसे लोगो की जानकारी के लिए बता दे कि यदि किसी भवन के तीन द्वार का प्रभाव हों तो उनका मिला जुला प्रभाव गृह स्वामी पर पड़ेगा। इसके अलावा खिड़कियों एवं रोशनदानों की स्थिती भी अपना प्रभाव दिखाती है। अगर दिशाओं के ग्रह प्रभावशाली एवं ताकतवर है तो वह द्घर मे सुख समृद्धि एवं शांति पूर्वक माहौल बनाकर रखेगें और अगर उनका प्रभाव क्षीण है और नीच प्रभाव में है तो इसके उल्ट असर दिखाएंगे।

अतः उपरोक्त बातों से सिद्ध होता है कि ज्योतिष वास्तु के साथ-साथ चलता है और इनका आपस मे गूढ़ / अटूट संबंध है। यह दोनो एक दूसरे के बगैर अधूरे हैं।

पंडित दयानन्द शास्त्री

M--09024390067 & 09711060179

Read more

राजस्थान में होगा प्रवासी भारतीय दिवस

जयपुर।। प्रवासी भारतीय दिवस इस वर्ष राजस्थान में आयोजित किया जा रहा है। सात जनवरी से जयपुर में होने वाले इस तीन दिवसीय आयोजन की सभी तैयारियां लगभग पूरी कर ली गई है। मुख्यमंत्री अषोक गहलोत ने कल इससे संबंधित सभी तैयारियों का जायजा लिया।

उन्होंने कहा कि मेहमानवाजी की जो परंपरा राजस्थान की रही है, उसी के अनुरूप प्रवासी भारतीय दिवस की तैयारिया की जा रही है। श्री गहलोत ने कहा कि नए वर्ष की शुरूआत में प्रदेष में हो रहे इतने बड़े आयोजन में आमजन के सहयोग से कामयाबी मिलेगी। मुख्यमंत्री ने विष्वास जताया कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आए प्रवासी भारतीय राजस्थान के संस्कृति और संस्कारों से प्रभावित जरूर होंगे।

Read more

शयन कक्ष: साउथ में सोयें मिलेगी पॉजीटिव एनर्जी

वस्त्तुशास्त्र में भवन बनाना, एक विज्ञान और कला दोनों का समावेश है वास्तुशास्त्र पूर्णरूप से एक ऐसा विज्ञान है जिसे आधुनिक समय में अब लोगों ने मान्यता दी है गृह स्वामी को उस भवन को किस दिन महूर्त करना चाहिए, किस दिन उसे गृह प्रवेश करना चाहिए, गृह स्वामी को वह भवन कितना आर्थिक उन्नति देगा इत्यादि यह सब वास्तुशास्त्र गृह स्वामी को बताता है।

अच्छी नींद अच्छे स्वास्थ्य की नींव होती है। लेकिन यह नींव तभी मजबूत हो सकती है जब हमारा शयन कक्ष स्वच्छ व हवादार हो। वास्तुशास्त्र में ऐसे अनेक उपाय हैं, जिन्हें उपयोग में लाकर आप अपने इस कक्ष की पॉजीटिव एनर्जी बढ़ा सकते हैं।

भवन में रसोई, स्नान गृह, स्त्रियों का कमरा, अध्धयन कक्ष, आंगुतक कक्ष और सबसे महत्वपूर्ण शयन कक्ष कहाँ होना चाहिए इन सब की स्थिति भवन में कहाँ और किस दिशा में हो इन सब का वर्णन करता है शयन कक्ष विश्राम करने का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है वास्तुशास्त्र में शयन कक्ष का सम्यक विचार किया गया है यदि गृह स्वामी भवन निर्माण करते समय शयन कक्ष को वास्तुशास्त्र के नियमों के अनुसार शयन कक्ष का निर्माण करवाए तो निद्रा के अतिरिक्त उसे अनेक प्रकार व्याधियों से छुटकारा अपने आप प्राप्त हो जाता है।

शयन कक्ष में पूर्व या दक्षिण दिशा की ओर पैर करके सोना चाहिए। पूर्व दिशा की ओर सिर करके सोने से विद्या प्राप्त होती है तथा दक्षिण दिशा की ओर सिर करके सोने से धन व आयु की प्राप्ति होती है। उत्तर या पश्चिम दिशा की ओर सिर करके सोने से आयु कम होती है तथा शरीर रोगी हो जाता है।

शयन कक्ष में देवी-देवताओं, पूर्वजों, हिंसक पशु-पक्षियों और रामायण-महाभारत के युद्ध-चित्र नहीं लगाने चाहिए क्योंकि इससे मन में नकारात्मक भाव व भय उत्पन्न होता है। कक्ष की दक्षिण-पश्चिम दिशा में सुंदर व मनोरम दिखाई देनेवाले चित्रों को लगाया जा सकता है।

वास्तु शास्त्र में दक्षिण दिशा को यम की दिशा कहा गया है दक्षिन दिशा का स्वामी “यम” है यानि मृत्यु का देवता, इसलिए प्राचीन काल में श्मशान ग्राम/नगर के दक्षिण में स्थित होती थी उतर दिशा धन के देवता (कोषाध्यक्ष) कुबेर की है इसीलिए वास्तुशास्त्र में व्यक्ति के लिए दक्षिण दिशा में सिर और उतर दिशा में पाँव इस प्रकार के निर्देश हैं परन्तु ऐसा क्यों यहाँ यह जानना आवश्यक है।

हमारी पृथ्वी के दो ध्रुव हैं १. उतरी ध्रुव २. दक्षिणी ध्रुव दोनों चुंबकीय सिद्धांतों पर कार्य करते हैं और हमारा शरीर भी इसी सिद्धांत पर इस तरह मनुष्य का सिर उतरी ध्रुव है और पैर दक्षिणी ध्रुव इसलिए यदि जब हम अपने सिर को उतर की और पैर दक्षिण की और कर के सोएगें तो चुंबकीय तरंगे विपरीत दिशा में कार्य करेंगी और हमे कभी भी अच्छी नींद नहीं आएगी और प्रातकाल तनावपूर्ण वातावरण में जागेंगे और शरीर में थकन होगी पश्चिम में सिर कर के सोने से मनुष्य को कई प्रकार रोगों से ग्रस्त होना पड़ता है, उतर की और सिर कर के सोने से मनुष्य को व्यर्थ के स्वप्न तथा नींद नहीं आती है।

इसलिए अपने शयन कक्ष में आप सदैव अपना सिर दक्षिण  की और या पूर्व की और कर के सोएं तो आपके जीवन में मंगल ही मंगल होगा।

क्यों रखें पश्चिम दिशा में शयनकक्ष

बैडरूम कई प्रकार के होते हैं। एक कमरा होता है- गृह स्वामी के सोने का एक कमरा होता है परिवार के दूसरे सदस्यों के सोने का। लेकिन जिस कमरे में गृह स्वामी सोता है, वह मुख्य कक्ष होता है।

अतः यह सुनिश्चित करें कि गृह स्वामी का मुख्य कक्ष; शयन कक्ष, भवन में दक्षिण या पश्चिम दिशा में स्थित हो। सोते समय गृह स्वामी का सिर दक्षिण में और पैर उत्तर दिशा की ओर होने चाहिए।

इसके पीछे एक वैज्ञानिक धारणा भी है। पृथ्वी का दक्षिणी ध्रुव और सिर के रूप में मनुष्य का उत्तरी ध्रुव और मनुष्य के पैरों का दक्षिणी ध्रुव भी ऊर्जा की दूसरी धारा सूर्य करता है। इस तरह चुम्बकीय तरंगों के प्रवेश में बाधा उत्पन्न नहीं होती है। सोने वाले को गहरी नींद आती है। उसका स्वास्थ्य ठीक रहता है। घर के दूसरे लोग भी स्वस्थ रहते हैं। घर में अनावश्यक विवाद नहीं होते हैं।

यदि सिरहाना दक्षिण दिशा में रखना संभव न हो, तो पश्चिम दिशा में रखा जा सकता है। स्टडी; अध्ययन कक्ष वास्तु शास्त्र के अनुसार आपका स्टडी रूम वायव्य, नैऋत्य कोण और पश्चिम दिशा के मध्य होना उत्तम माना गया है।

ईशान कोण में पूर्व दिशा में पूजा स्थल के साथ अध्ययन कक्ष शामिल करें, अत्यंत प्रभावकारी सिद्ध होगा। आपकी बुद्धि का विकास होता है। कोई भी बात जल्दी आपके मस्तिष्क में फिट हो सकती है। मस्तिष्क पर अनावश्यक दबाव नहीं रहता।

निम्न बातों का जरुर रखे धयन/ख्याल

जहां तक हो सके शयन कक्ष में टी.वी., कंप्यूटर जसे इलैक्ट्रानिक गजेट्स नहीं रखने चाहिए। अगर मजबूरी में रखना हो तो कमरे के आग्नेय कोण (दक्षिण-पूर्व) में ही रखें। काम न होने की स्थिति में उनकी स्क्रीन को कपड़े से ढक कर रखें। इसी तरह ड्रेसिंग टेबल के शीशे को भी ढक कर रखें।

शयन कक्ष में बीम या टांड के नीचे नहीं सोना चाहिए क्योंकि इससे दिमाग में भारीपन व तनाव उत्पन्न होता है।

सोते समय पैर द्वार की तरफ न हों क्योंकि इस स्थिति में पैर मृतक के रखे जाते हैं।

घर में पालतू जानवर हैं तो इन्हें वायव्य कोण (उत्तर-पश्चिम) में रखना चाहिए।

रुपये-पैसे और सोने-चांदी के जेवरों की तिजोरी को भी इस कक्ष में रखने से बचना चाहिए। अगर रखना पड़ जाए तो तिजोरी कमरे की दक्षिण दिशा में इस तरह रखें कि से खोलते समय उसका मुंह उत्तर दिशा की ओर हो। यह दिशा कुबेर की होती है और ऐसा करने से तिजोरी के धन में वृद्धि होती रहती है।

पंडित दयानन्द शास्त्री

Mobile. 09024390067 & 09711060179

Read more

छत्तीसगढ़ में बने 9 नए जिले

रायपुर॥ प्रदेश में 01 जनवरी से नौ और जिले अस्तित्व में आ गए हैं। इन्हें मिलाकर प्रदेश में अब कुल सत्ताईस जिले हो गए हैं। इन नए जिलों का विधिवत उद्घाटन समारोह पूर्वक इसी महीने की अलग-अलग तारीखों में मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह करेंगे। इन समारोह के लिए प्रशासनिक स्तर पर तैयारियां जोर-शोर से चल रही हैं।

सभी नए जिलों में पदस्थ विशेष कर्तव्यस्थ अधिकारी 01 जनवरी से ही इन जिलों के कलेक्टर बन गए हैं। इन नए जिलों के लिए प्रशासनिक अमले को नियुक्त करने की प्रक्रिया अभी जारी है। नए साल से अस्तित्व में आए ये नए जिले हैं- बेमेतरा, बलौदाबाजार, बालोद, बलरामपुर, गरियाबंद, मुंगेली, सूरजपुर, कोण्डागांव और सुकमा।

Read more

शल्य चिकित्सक (सर्जन) बनने का योग

जन्म पत्रिका में अनेक प्रकार के योगों का निर्माण ग्रहों की स्थिति अनुसार होता है। ग्रहों से बनने वाले योगों में से कुछ योग ऎसे होते हैं, जो व्यक्ति के चिकित्सक बनने में सहायक होते हैं, जो इस प्रकार हैं-

कुंडली में आत्मकारक ग्रह अपनी मूल त्रिकोण राशि में स्थित होकर लग्न में हों और उनकी युति पंचमेश से होने पर व्यक्ति को चिकित्सक बनाने में सहायक है।

मेष, सिंह, धनु या वृश्चिक राशि का संबंध दशम भाव से होने पर व्यक्ति चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है।

राहू-केतु बली व शुभ स्थान पर होने से व्यक्ति चिकित्सक बनता है।

दशम भाव या दशमेश से मंगल अथवा केतु का दृष्टि-युति संबंध होने पर शल्य चिकित्सक व्यक्ति बन सकता है।

एकादश भाव आय का, पंचम भाव संतान, विद्या, मनोरंजन का भाव है। इस एकादश भाव से पंचम भाव पर सूर्य, चंद्र, शुक्र की सप्तम पूर्ण दृष्टि पड़ती है। वहीं मंगल की दशम भाव से अष्टम एकादश भाव से सप्तम व धन, कुटुंब भाव से चतुर्थ दृष्टि पूर्ण पती है। गुरु धर्म, भाग्य भाव नवम से पंचम भाव पर नवम दृष्टि डालता है तो एकादश भाव से सप्तम लग्न से पंचम दृष्टि पूर्ण पती है। शनि की तृतीय दृष्टि तृतीय भाई, पराक्रम भाव से एकादाश भाव से सप्तम व अष्टम भाव से दशम पूर्ण दृष्टि पड़ती है। यहाँ पर हमारे अनुभव अनुसार राहु-केतु जो छाया ग्रह हैं, उनके बारे में विशेष फल नहीं मिलता न ही इनकी दृष्टि को माना जाता है न ही किसी एकादश भाव पर रहने से पंचम भाव पर कोई असर आता है।

सूर्य का प्रभाव----

सर्वप्रथम सूर्य को लें यहाँ से यदि पंचम भाव पर सिंह राशि अपनी स्वदृष्टि से देखता है तो भले ही आय में कमी हो, लेकिन विद्या व संतान उत्तम होती है, संतान के बहोने पर लाभ मिलता है। एकादश भाव में कोई ग्रह हो, नीच को छोसभी शुभफल प्राप्त होते हैं। सूर्य की तुला राशि पर दृष्टि संतान व विद्या में कष्टकारी होती है। अतः ऐसे जातकों को सूर्य की आराधना व सूर्य से संबंधित वस्तुओं का दान अपने शरीर से सात या नौ बार उतारकर रविवार को करना चाहिए। इस प्रकार अनिष्ट प्रभाव से बचा जा सकता है। जिन ग्रहों की नीच दृष्टि पड़े, उससे संबंधित दान करें।

चंद्रमा का प्रभाव----

चंद्रमा की स्वदृष्टि पंचम भाव पर पड़े तो जातक शांति नीति वाला, ज्ञानी, सद्‍चरित्र, गुणी, मान-सम्मान पाने वाला होता है उसे भूमि में गड़ा धन मिलता है। ऐसा जातक मिलनसार होता है। अशुभ वृश्चिक राशि को देखता हो तो चंद्र की वस्तु दान करना ही श्रेष्ठ रहेगा। मंगल की शत्रु नीच दृष्टि यदि पंचम भाव पर पती हो तो संतान से कष्ट, विद्या में कमी रहती है। यदि मित्र स्वदृष्टि हो तो संतान आदि में उत्तम लाभ रहता है।

लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम भाव में सूर्य, चंद्रमा अथवा गुरू के साथ मंगल की युति जातक को डॉक्टर बनाने में सहायक है।

यदि लग्न में मंगल स्वराशि अथवा उच्च राशि का हो, सूर्य पंचम भाव से संबंध बनाए, तो ऎसे योग वाला सर्जरी में निपुण होता है।

कुंडली में सूर्य, मंगल और गुरू सहित केतु भी बली होकर लग्न, पंचम और दशम भाव से संबंध बनाए, तो जातक चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता पाता है।

यदि जन्मकुंडली में कर्क राशि और मंगल दोनों बलवान हों तथा लग्न एवं दशम भाव से मंगल और राहू का संबंध किसी भी रूप में हो, तो जातक चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता है। ऊपर बताए गए सामान्य योग हैं। पूर्ण जानकारी के लिए ज्योतिषी को कुंडली दिखाएं...

शनि-राहु बनाएंगे डॉक्टर!

चिकित्सा के क्षेत्र में सफलता पाने की चाह रखने वालों के शनि और राहु सहायक ग्रह होते हैं। शनि चिकित्सा के क्षेत्र में प्रवेश करवाता है। शनि लौह तत्व का कारक है तथा डॉक्टरों का अधिकतम कार्य लोहे से बने औजारों और मशीनों से ही होता है। शनि में साथ यदि राहु की भी सही स्थिति कुंडली में बन जाए तो व्यक्ति डॉक्टर होने के साथ-साथ शल्य चिकित्सक या विशेषज्ञ होता है।

चिकित्सा शिक्षा में बेहतर परिणाम कैसेयदि जातक की कुंडली में शनि कर्म, पराक्रम सप्तम आय स्थान में स्थित हो तो विद्यार्थी का रुझान फिजिक्स, कैमेस्ट्री, बॉयोलॉजी की तरफ होता है। यदि इन्हीं घरों में शनि उच्च का स्वग्रही या मित्र राशि में हो तो डॉक्टरी पेशे में उसको विशेष दक्षता प्राप्त होती है। शनि कमजोर हो तो थोड़ी सी अधिक मेहनत कर बेहतर परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।

कैसे मिल सकती है चिकित्सा में ऊंचाई शनि का एक अन्य नाम है मंद अर्थात धीमा। वैसे तो धीमी शुरुआत को अच्छा माना जाता है। किंतु आज धीरे नहीं चला जा सकता। आप चिकित्सक हैं और आपको आपकी क्षमता के अनुसार नाम और दाम नहीं मिल रहा है तो आपको शनि का ही सहयोग लेना होगा। शनि ही आपको इस पेशे में नई ऊंचाई पर पहुंचाएगा। - आफिस में नीले पर्दे और हल्के रंग दीवार पर इस्तेमाल करें। - नीले रंग की प्लास्टिक की बोतल से पानी पीएं। - थोड़ा श्रम अधिक करें। - असहाय मरीजों की सहायता करें।कुछ ही दिनों में आपको इसका बेहतर परिणाम मिलने लगेंगे!

हस्तरेखा से जाने डाक्टर बनाने के योग---

यदि किसी व्यक्तिकी हथेली में बुध पर्वत पूर्ण विकसित हो, कनिष्ठिका अंगुली पूरी लंबाई लिए हो, बुध पर्वत पर तीन दोष रहित खड़ी रेखाएं हों तो उसके सफल डॉक्टर बनने के योग बनते हैं। अगर इन गुणों के साथ ही मंगल पर्वत पूर्ण विकसित हो तो उसके सफल सर्जन बनने की संभावना होती है। इन विशेषताओं के साथ यदि मंगल पर्वत दबा हुआ हो और बृहस्पति पर्वत सुविकसित हो तथा उस पर वर्ग का चिह्न हो तो वह व्यक्ति प्रतिष्ठित वैद्य बनता है। इन योगों में ध्यान रखने की बात यह है कि ऎसी स्थिति दोनों हाथों में हों, रेखाएं गहरी और स्पष्ट हों, मणिबंध रेखाएं सुविकसित हों तभी यह योग पूर्ण फलित होता है।

पंडित दयानन्द शास्त्री

M--09024390067 & 09711060179

Read more

तेईसवां सड़क सुरक्षा सप्ताह आरंभ

पोर्ट ब्लेयर॥ द्वीपसमूह में तेइसवां सड़क सुरक्षा सप्ताह कल शुरू हुआ। सप्ताह के दौरान कई कार्यक्रमों और गतिविधियों के माध्यम से लोगों को सड़क सुरक्षा के बारे में जागरूक किया जा रहा है। कल पोर्ट ब्लेयर के अग्निशमन मुख्यालय में एक रक्तदान शिविर का आयोजन किया गया, जिसमें दो सौ पुलिस कर्मियों सहित अन्य लोगों ने रक्तदान किया।

इस अवसर  पर मुख्य अतिथि उप-पुलिस महानिरीक्षक कानून व्यवस्था आनंद मोहन ने उपस्थिति को नववर्ष की शुभकामनाएं देते हुए सड़क सुरक्षा सप्ताह मनाए जाने के कारणों पर प्रकाश डाला। दक्षिण अंडमान के पुलिस अधीक्षक ने प्रतिभागियों को यातायात नियमों का पालन करने की सलाह दी।

रोग विज्ञानी डॉ0 वाजिद अली शाह ने उपस्थिति को रक्तदान और इसके उद्देश्यों के बारे में बताया। शिविर में मुख्य  अतिथि और पुलिस अधीक्षक दक्षिण अंडमान ने स्वयं रक्तदान में हिस्सा लिया। उनके अलावा यातायात और आर.बी.एन. के पुलिस कर्मियों तथा ऑटो और ट्रक चालकों सहित कुल बत्तीस लोगों ने रक्तदान किया।

सड़क सुरक्षा सप्ताह के दौरान नेत्र जांच शिविर, व्याख्यान, खेल गतिविधियां और वाहन रैली जैसे अन्य कार्यक्रम भी आयोजित किए जाएंगे।   इस बीच पुलिस प्रशासन से वाहन चालकों से अपील की है कि वे बिना हैलमेट और ड्राइविंग लाइसेंस तथा नशे की हालत में वाहन न चलाएं और अपने वाहनों में उपयुक्त नम्बर प्लेट लगाएं और रंगीन शीशों का इस्तेमाल न करें।

पुलिस ने आम जनता से यातायात नियमों का कड़ाई से पालन करते हुए सड़क सुरक्षा सप्ताह के दौरान आयोजित होने वाले कार्यक्रमों मंे शामिल होने अनुरोध किया है। सड़क सुरक्षा सप्ताह के दौरान शिक्षण संस्थाओं में विभिन्न प्रकार के प्रतियोगिताओं का आयोजन किया जा रहा है।

Read more

2012 में शनि देव का सभी राशियों पर प्रभाव

मेष राशि

आपकी राशि से 15 नवंबर 2011 से शनि, सप्तम राशि यानी तुला को प्रभावित कर रहा है। गोचर में गुरु आपकी राशि में ही विचरण कर रहा है। दोनों ही ग्रह 16 मई 2012 तक एक-दूसरे को ऊर्जा और शक्ति का आदान-प्रदान कर रहे हैं। शनि कुछ समय के लिए वक्रगति प्राप्त कर कन्या राशि में भी आएगा और उसी समय के आसपास गुरु भी वृष राशि में प्रवेश करेगा। शनि और बृहस्पति राशि चक्र के बहुत ही शक्तिशाली ग्रह हैं।

यदि आप उद्योगपति हैं या व्यवसायी हैं तो आप अपने वर्तमान कार्यक्षेत्र का विस्तार कर सकते हैं और यदि किसी और क्षेत्र में किस्मत आजमाना चाह रहे हैं तो इन दोनों ग्रहों की उपस्थिति आपको ऐसा करने में पूर्ण मददगार रहेगी।नई पार्टनरशिप या एसोसिएशन में भी प्रवेश किया जा सकता है। काफी यात्राएं करनी पड़ेंगीऔर आपकी उपलब्धियों में वृद्धि होगी।

जो लोग नौकरी में हैं उनके लिए स्थितियां अनुकूलता लिए रहेंगी। पदोन्नति या उन्नति भी हो सकती है। जो लोग नौकरी बदलना चाह रहे हैं तो उनको किसी प्रकार की परेशानी का सामना नहीं करना पड़ेगा।व्यक्तिगत स्तर पर चीजें सुचारू रूप से चलेंगी। जो लोग पार्टनर की खोज में हैं उन्हें आसानी से मिल जाएगा। पारिवारिक मामले नियंत्रण में रहेंगे और वातावरण आनंददायक बना रहेगा।

आर्थिक स्थिति रूप से यह समय बहुत अच्छा रहेगा। 16 मई 2012 को शनि वक्रगति से कन्या राशि में प्रवेश करेगा और 4 अगस्त 2012 को वापस तुला राशि में आएगा।बृहस्पति अगली राशि वृष में प्रवेश करेगा और लगभग एक साल वहां रहेगा। दूसरे शब्दों में कह सकते हैं कि शनि छठे और बृहस्पति दूसरे भाव में विचरण रहेगा। यद्यपि यह समय बहुत ही छोटा है लेकिन यह बहुत ही फलदायी रहेगा।

किसी प्रोजेक्ट या असाइनमेंट के द्वारा अच्छा धन लाभ अर्जित होने की संभावना है।यदि कोई मसला कोर्ट-कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो सकता है। यदि किसी परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी। विरोधियों पर विजय प्राप्त होगी।

नौकरी में अचानक उपलब्धि का योग भी बन रहा है। आपके मान-सम्मान में वृद्धि होगी।अगस्त दिसंबर 2012 के मध्य शनि तुला राशि में ही रहेगा। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 तक शनि अस्त रहेगा बाकी समय शनि आपके पक्ष में रहेगा। आप ऐसे कुछ निर्णय ले सकते हैं जो उलटवार कर सकते हैं।

वृषभ राशि

आपकी राशि से शनि छठे भाव में विचरण कर रहा है क्योंकि तुला राशि वहीं है। क्रूर ग्रह जब छठे भाव से विचरण करते हैं तो बहुत अच्छे परिणाम देते हैं। प्रत्येक दृष्टि से शनि यहां बहुत कंर्फटेबल है, अतः इस भाव से विचरण करते समय वह स्वतः ही आपके लिए अतिरिक्त मददगार सिद्ध होंगे।

कॉर्पोरेट, व्यवसायी या उद्योगपति के रूप में अपनी योजनाओं और प्रोजेक्ट को आसानी से क्रियान्वित करने में सफल रहेंगे। यदि किसी प्रांत या देश से मदद की अपेक्षा कर रहे हैं तो वह आसानी से प्राप्त हो जाएगी और यदि विदेश जाने की योजना बना रहे हैं तो वहां भी आपको किसी प्रकार की समस्या का सामना नहीं करना पड़ेगा।

यदि नौकरी में हैं तो स्थितियों में अनुकूलन बना रहेगा और आपको कुछ अच्छे अवसर भी प्राप्त होंगे। जो लोग परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो उन्हें सफलता प्राप्त होगी। पदोन्नति और बदलाव भी संभावित है। पैतृक संपत्ति को लेकर कोई मामला कोर्ट-कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो जाएगा। विरोधी चाहकर भी आपको हानि नहीं पहुंचा पाएंगे।

8 मई से 26 जून 2012 के मध्य शनि वक्री रहेगा। 16 मई 2012 को शनि वक्रगति से कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान अपने कैरियर से संबंधित निर्णय लेते समय आपको अतिरिक्त सावधान रहने की आवश्यकता है। नए निवेश पूर्ण जांच-परख के बाद ही करें।वाद-विवाद में न पड़ें अन्यथा हानि हो सकती है, जिससे सकारात्मक विचारधारा से बचा जा सकता है। यद्यपि आपको बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होते रहेंगे और यदि आपका चुनाव उत्तम है तो यह समय आपके लिए काफी मददगार सिद्ध होगा। थोड़ी-सी सावधानी परिणामों की दिशा परिवर्तित कर सकती है।

जैसा कि पहले बताया गया है कि शनि जून में मार्गी होगा और 4 अगस्त को दोबारा तुला राशि में प्रवेश करेगा और साल के अंत तक इसी राशि में विचरण करेगा। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त रहेगा। अस्त शनि की नकारात्मक विशेषताएं सामने आने लगती है जो उसमें वृहत स्तर पर मौजूद हैं।

जब शनि सूर्य की उपस्थिति से प्रभावित होता है तो शनि आक्रामक हो जाता है। इस दौरान आपको अत्याधिक सावधान रहने की आवश्यकता है। अन्यथा आप अपने कैरियर पार्टनर या एसोसिएट से अलग हो जाएंगे। वैसे शनि में आपके कैरियर ग्राफ में आमूलचूल परिवर्तन लाने की पूर्ण क्षमता है।

मिथुन राशि

शनि 15 नवंबर 2011से आपके पांचवें भाव में चल रहे हैं। शनि का कन्या में पिछला विचरण लगभग ढाई साल काफी थका देने वाला और हर कदम पर परेशानियां पैदा करने वाला था। शनि का पंचम भाव में विचरण उत्तम सिद्ध होगा और यह शनि की उच्च राशि तुला है। इस दौरान अपने रचनात्मक विचारों और प्रोजेक्टस के साथ आगे बढ़ने में मददगार सिद्ध होगा।8 फरवरी 2012 तक शनि तुला राशि में विचरण करेगा।

यदि आप एक्टिंग मॉडलिंग, सिंगिग, आर्ट, म्यूजिक, डांसिंग आदि से जु़ड़े हैं तो आप अपनी पहचान बनाने में सफल रहेंगे। आपको कुछ समुचित अवसर प्राप्त होंगे। यदि आप एक बिजनेसमैन हैं तो आप अपनी योजनाओं पर बिना किसी परेशानी के अमल करने में सफल रहेंगे।

नौकरीपेशा लोगों के लिए देश के साथ-साथ विदेश में भी आपको अच्छे अवसर प्राप्त होंगे। यदि प्रेममय हैं तो यह संबंध विवाह में परिणत हो सकता है। प्रतियोगी निराश नहीं होंगे। यदि रिसर्च आदि से जु़ड़े हैं तो इस भाव में शनि की यात्रा आपकी इच्छाओं की पूर्ति करने में काफी हद तक मददगार सिद्ध होगी।देश-विदेश की यात्राएं आपकी छवि और कैरियर को बनाने में अहम भूमिका अदा करेंगी।

शनि 8 फरवरी और 26 जून 2012 के मध्य वक्र गति से चलेगा। 16 मई 2012 को पिछली राशि कन्या में प्रवेश करेगा। यदि आप शनि की गति के साथ तारतम्य बनाए रखेंगे और परिणामों का अनुसरण करते रहेंगे तो यह आपको नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं करेगा।यदि आप इसे अनदेखा करते रहे तो फिर शनि आपको पकड़ लेगा। इसका प्रभाव भावनात्मक स्तर पर देखा जा सकता है और साथ ही जो योजनाएं कुछ समय पहले लगभग पूर्ण लग रही थी उनमें अचानक अवरोध आ सकता है।

जिन लोगों का आपकी गतिविधियों से काफी लेना-देना है उनके साथ भी वाद विवाद की स्थिति पनप सकती है। शनि 4 अगस्त 2012 को अपनी उच्चराशि तुला में वापस आ जाएगा और वर्ष के अंत तक वहीं रहेगा।शनि अस्त हो जाएगा जो 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य होगा।

इस दौरान अधिकतर समय सूर्य नीचस्थ रहेगा और शनि के ऊपर से गुजरेगा। मुख्य प्रोजेक्ट्स के बारे में सावधानी बरतने की आवश्यकता है। पारिवारिक मसले उभर सकते हैं। बच्चों के साथ मतभेद हो सकते हैं। स्वास्थ्य की समस्याएं आपको या आपके परिवार को तंग कर सकती हैं।

कर्क राशि

शनि 15 नवंबर 2011 से 4 नवंबर 2014 के मध्य आपकी राशि से चतुर्थ भाव में भ्रमण करेगा। नवंबर 2011 से 8 फरवरी 2012 तक शनि तुला राशि में विचरण करेगा जो आपका चतुर्थ भाव है। चतुर्थ भाव आदमी का कंफर्ट जोन है और जब वह चतुर्थ भाव का विचार करता है तब पूर्ण शांति का अनुभव करता है।शायद यही कारण है कि कुंडली में चतुर्थ भाव मां, घर, अबाधित नींद और पूर्ण सुरक्षा का प्रतिनिधित्व करता है।

यद्यपि शनि यहां किसी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं करता लेकिन इसकी एक आदत है कि जो इन क्षेत्रों में जो कुछ भी गलत हो रहा है उसे उजागर करता है। शनि फरवरी 2012 से वक्री होगा जो 26 जून 2012 तक रहेगा।शनि अपनी पहली वाली राशि यानि कन्या में 16 मई को वापस आएगा और 4 अगस्त 2012 तक यहीं भ्रमण करेगा।

फरवरी से अगस्त के मध्य का समय वर्णित क्षेत्रों में काफी राहत प्रदान करेगा। यदि आप अपने कैरियर, व्यवसाय या उद्योग में किसी प्रकार की समस्या का सामना कर रहे हैं तो अपने मित्र-शुभचिंतकों की मदद से उसका हल किया जा सकता है।आपके लिए सलाह है कि अपने वर्तमान कार्य या प्रोजेक्ट में अपनी पूर्ण ऊर्जा लगाएं और परिश्रम से कार्य करें। अपव्यय पर नियंत्रण लगाएं।

यदि नौकरी की तलाश में हैं तो आपको नौकरी तलाश करने में कोई परेशानी नहीं होगी। जो लोग नौकरी में बदलाव या उन्नति के लिए प्रयासरत हैं तो उनको आशानुकूल परिणाम प्राप्त होंगे।पैतृक संपत्ति को लेकर यदि कोई मामला कोर्ट में विचाराधीन है तो उसका फैसला करने में ही भलाई है। कुछ आर्थिक तंगी हो सकती है।

4 अगस्त 2012 से साल के अंत तक शनि तुला राशि में ही रहेगा। इस दौर में आपको मिश्रित परिणाम ही प्राप्त होंगे। पूर्ण प्रयासों के बावजूद आपकी कुछ योजनाएं और प्रोजेक्ट्स आगे नहीं बढ़ पाएंगे।वर्तमान कार्यों में भी आपको समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। आपसी संबंधों में भी तनाव आ सकता है। कार्य का बोझ बढ़ेगा और कभी-कभी इसे पूर्ण कर पाना कठिन भी होगा।

9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त होगा। इस दौरान आप मानसिक रूप से परेशान हो सकते हैं और समय-समय पर भावनात्मक मसले ऊभर सकते हैं जो आपको तंग करेंगे। स्थितियों को गहराई से समझें और मेडिटेशन पर जोर दें।

सिंह राशि

15 नवंबर 2011 से शनि आपके तृतीय भाव में विचरण कर रहा है यहां वह आने वाले ढाई वर्षों तक रहेगा। शनि जब तृतीय भाव में विचरण करता है जो वह यहां पर बहुत ही कंफर्टेबल होता है। नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य शनि सीधी गति से चलेगा और आपकी योजनाओं और प्रोजेक्ट्स को क्रियान्वित करने में आधारभूत मदद करेगा।

आपके कुछ अहम विचार क्रियान्वित होंगे और उनका विस्तार भी होगा। आपकी वर्तमान परियोजनाओं में लाभ की स्थितियां निर्मित होंगी। यदि नौकरी, पदोन्नति, उन्नति या बदलाव की तलाश में हैं तो आपको बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होंगे। आप महत्वपूर्ण निर्णय लेंगे जिनसे आपकी प्रतिष्ठा में बढ़ोतरी होगी।प्रोफेशनल्स या जो लोग सृजनात्मक क्षेत्र से जु़ड़े हैं इस दौरान उनको बहुत अच्छे फल प्राप्त होंगे।

यात्राएं नए आयाम प्रदान करने वाली सिद्ध होंगी। कुछ महत्वपूर्ण लोगों से मुलाकात होगी। फरवरी और 26 जून 2012 के मध्य शनि वक्रगति से चलेगा। अपनी इस गति से चलते हुए 16 मई 2012 शनि अपनी पहली राशि कन्या राशि में प्रवेश करेगा और 4 अगस्त 2012 को फिर से तुला राशि में लौटेगा।

फरवरी और अगस्त के मध्य उत्थान और विकास की गतिविधियों में अत्यधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। यदि आप शांत चित्त और ठीक से विचार कर कार्य करेंगे तो यह दौर अच्छे गुजर जाएगा, अन्यथा इन क्षेत्रों में समस्याओं का सामना करने के लिए तैयार रहें।गलत निर्णय या अधिक खर्च के कारण धन की कमी महसूस होगी।

घरेलू मसले चिंता का विषय हो सकते हैं। अगस्त और दिसंबर 2012 के मध्य शनि तुला राशि में आगे बढ़ेगा जो आपकी राशि से सुंदर संयोग बनाएगा। कैरियर से संबंधित सभी समस्याओं के समाधान प्राप्त होंगे। बहुत अच्छे अवसर प्राप्त होंगे जो आपके पूरे व्यक्तित्व में परिवर्तन करने वाले सिद्ध होंगे।आर्थिक स्थिति में सुदृ़ढ़ता आएगी। प्रॉपर्टी, वाहन, सोना-चांदी में निवेश की संभावनाएं भी बलवती हो रही हैं। इस दौरान आपको काफी यात्राएं करना पड़ेंगी जो नए आयाम प्रदान करने वाली होंगी। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य शनि अस्त होगा इसलिए सावधानी बरतने की आवश्यकता है।

कन्या राशि

शनि आपकी राशि में पिछले ढाई वर्ष से चल रहा था। 15 नवंबर 2011 को शनि ने तुला राशि में प्रवेश किया है जो कि शनि की उच्च राशि है। यहां से आपको राहत की सांस मिलेगी। आपके लिए 15 नवंबर से 16 मई 2012 के मध्य का समय हर तरह से बहुत अच्छा है। धन संबंधी समस्याएं एक बाद एक हल होने से आपको काफी राहत प्राप्त होगी। रुके हुए धन की प्राप्ति भी हो सकती है।

आर्थिक और प्रोफेशनल क्षेत्र के विस्तार की संभावनाएं  भी बलवती हो रही हैं। इस दौरान आप किसी नए समझौते या पार्टनरशिप में प्रवेश कर सकते हैं। जो लोग नौकरी बदलना चाह रहे हैं तो उनको इच्छित नौकरी प्राप्त हो जाएगी। विदेश से भी कुछ अच्छे अनुबंध प्राप्त हो सकते हैं।

पारिवारिक स्तर पर उत्सव संपन्न हो सकता है या कोई शुभ समाचार प्राप्त हो सकता है।शनि वक्रगति से 16 मई 201 2 को वापिस आपकी राशि में लौटेगा जो यहां पर 4 अगस्त 2012 तक रहेगा। इस दौरान आपको अत्यधिक सचेत रहने की आवश्यकता है। निकटस्थ जनों के साथ मनमुटाव की स्थिति पनप सकती है। आर्थिक लेनदेन में पूर्ण सावधानी बरतने की नितांत आवश्यकता है।

अपने स्वास्थ्य को भी अनदेखा नहीं करना चाहिए।4 अगस्त 2012 को शनि तुला में प्रवेश करेगा और वर्षपर्यंत यहीं विचरण करेगा। अगस्त से 9 अक्टूबर के मध्य यह काफी मददगार सिद्ध होगा। आप अधूरे कार्यों को पूर्ण कर सकेंगे। कुछ योजनाएं और कार्य जो लगभग बंद हो गए थे उन्हें पुनर्जीवित किया जा सकता है भाग्य का सहयोग प्राप्त होगा और विदेश से लाभ प्राप्त होने से इंकार नहीं किया जा सकता। परिवार में कोई बड़ा उत्सव भी संपन्न हो सकता है।

9 अक्टूबर से 12 नवंबर के मध्य जब शनि अस्त होगा तो उस समय सतर्क रहने की आवश्यकता है। आपको सलाह दी जाती है कि इस दौरान महत्वपूर्ण निर्णय न लें। वैसे दैनिक कार्यों और जरूरतों की पूर्ति में समस्या नहीं आएगी। बाकी समय, 12 नवंबर से लेकर साल के अंत तक बहुत ही उत्साहवर्धक रहेगा।नई बातें घटने लगेंगी और जटिल समस्याओं के हल प्राप्त होंगे।

प्रोफेशनल और व्यक्तिगत जीवन सुचारु चलेगा। यह समय आमूलचूल परिवर्तन का है जहां बहुत सी नयी चीजें घटित होंगी जो आने वाले वर्षों में मददगार सिद्ध होंगी।वर्तमान में कन्या, तुला तथा वृश्चिक राशि वाले जातकों पर शनि की साढ़ेसाती चल रही है एवं वृषभ व मीन राशि वाले जातक ढैया से प्रभावित हैं। शनि की शांति तथा कृपा के लिए ये निर्दिष्ट उपाय कर सकते हैं।

व्रत : शनिवार का व्रत रखें।

व्रत के दिन शनिदेव की पूजा (कवच, स्तोत्र, मंत्र जप) करें। शनिवार व्रत कथा पढ़ना भी लाभकारी रहता है। व्रत में दिन में दूध, लस्सी तथा फलों के रस ग्रहण करें। सायंकाल हनुमानजी या भैरवजी का दर्शन करें। काले उड़द की खिचड़ी (काला नमक मिला सकते हैं) या उड़द की दाल का मीठा हलवा ग्रहण करें।

दान: शनि की प्रसन्नता के लिए उड़द, तेल, इन्द्रनील (नीलम), तिल, कुलथी, भैंस, लोह, दक्षिणा और श्याम वस्त्र दान करें। किसी भी शनि मंदिरों में शनि की वस्तुओं जैसे काले तिल, काली उड़द, काली राई, काले वस्त्र, लौह पात्र तथा गुड़ का दान करने से इच्छित फल की प्राप्ति होती है।

रत्न/धातु: शनिवार के दिन काले घोड़े की नाल या नाव की सतह की कील का बना छल्ला मध्यमा में धारण करें।

औषधि: प्रति शनिवार सुरमा, काले तिल, सौंफ, नागरमोथा और लोध मिले हुए जल से स्नान करें।

तुला राशि:

शनि 15 नवंबर 2011 को आपकी राशि में अगले ढाई साल के लिए आ गया है। यह आपकी राशि से 30 वर्षों के बाद गुजर रहा है।जिस दिन शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा उससे 16 मई 2012 तक आपकी राशि में रहेगा। शनि 8 फरवरी 2012 को वक्रगति को प्राप्त होगा और 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान शनि दो प्रकार के परिणाम प्रदान करेगा।

पहला पैटर्न नवंबर से फरवरी 2012 तक होगा। आपको अपने विचारों को क्रियान्वित करने में समस्याओं का सामना करना पड़ेगा जिनमें काफी प्रगति हो चुकी थी। संतोषजनक परिणाम प्राप्त करने के लिए आपको अपनी योजनाओं और कार्य प्रणाली में फेरबदल करने की नितांत आवश्यकता है।बिना पूर्व सोच विचार के कोई नया निवेश नहीं करना चाहिए। शनि 8 फरवरी 2012 को वक्री हो जाएगा और 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। इस दौरान आपको सतर्क रहने की आवश्यकता है।

इस समय लिए गए गलत निर्णय महंगे साबित होंगे।आपका या किसी परिजन का स्वास्थ्य चिंता का विषय हो सकता है। जो लोग स्टॉक मार्केट से जु़ड़े हैं उन्हें अतिरिक्त सावधानी बरतने की जरूरत है। 16 मई से 4 अगस्त 2012 के मध्य का समय एक अच्छी शुरूआत देगा। आपकी कुछ योजनाएं बिना किसी झंझट के क्रियान्वित हो सकती है।मित्र शुभचिंतकों का पूर्ण सहयोग प्राप्त होगा।

लंबी दूरी की यात्राएं आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेंगी। संपत्ति संबंधी यदि कोई मामला कोर्ट में चल रहा है तो उसको फैसला आपके पक्ष में हो सकता है।शनि 4 अगस्त 2012 को वापिस तुला राशि में आ जाएगा और फिर पूरे साल यहीं पर रहेगा। इस दौरान शनि अधिकतर अच्छे परिणाम ही प्रदान करेगा।

जो बाधाएं और झंझट पहले आ रहे थे वो अब तंग नहीं करेंगे। 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य सावधानी बरतने की आवश्यकता है।साधारण रूप से यह उत्साहवर्धक समय है।

आपको परिवार और बच्चों पर अधिक ध्यान देने की आवश्यकता है। यदि आप उनके साथ समय व्यतीत करेंगे और इन मसलों पर ध्यान देंगे तो ये आपके लिए मददगार सिद्ध होंगे।परिजनों के साथ अर्थपूर्ण बातचीत करेंगे और उन्हें कार्यों में लगाएंगे तो इससे आपको अपनी व्यक्तिगत समस्याओं को हल करने में काफी मदद मिलेगी।

वृश्चिक राशि:

शनि 15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य सीधी गति से चलेगा और तुला राशि से गुजरेगा जो आपका बारहवां भाव है। जहां तक योजना और स्कीम बनाने और नए वातावरण में घुलने मिलने का संबंध है तो इसके लिए यह बहुत अच्छा समय है। आप किसी बड़े कार्य की योजना बना सकते है या अपनी रिसर्च प्रारंभ कर सकते हैं जो बीच में रुक गई थी।

लंबे समय की सारी गतिविधियां इस समय प्रारंभ की जा सकती हैं। जहां तक वर्तमान प्रोफेशन या कैरियर का संबंध है वहां स्थितियों को अपने पक्ष में करने के लिए आपको अतिरिक्त ध्यान देने की आवश्यकता है। कभी-कभी विघ्न और बाधाओं के चुनौतियां आएंगी लेकिन यदि आप सजग हैं तो आप इन कठिनाईयों से आसानी से निपट लेंगे।

धन संबंधी मामलों में सावधानी बरतें। यदि प्रॉपर्टी या फिक्स्ड एसेट्स में निवेश करने की योजना बना रहे हैं तो ऐसा करने के लिए समय अच्छा है।फरवरी और अगस्त के मध्य आपको कई अवसर प्राप्त होंगे और अलग प्रकार की स्थिति उभर सकती हैं। फरवरी के बाद अचानक धन के आगमन में वृद्धि होगी। आपकी कुछ योजनाएं जिन पर आप पिछले काफी समय से काम कर रहे थे वे अब चालू हो सकती हैं।आपके सामाजिक और प्रोफेशनल दायरे का विस्तार होगा और यह आपकी प्रतिष्ठा में वृद्धि करेगा।

मित्र और यात्रा कारगर सिद्ध होंगे। पारिवारिक जीवन शांतिपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई उत्सव भी संपन्न हो सकता है। जो लोग नौकरी में बदलाव चाह रहे हैं उन्हें आसानी से अच्छी नौकरी प्राप्त हो जाएगी।शनि 4 अगस्त 2012 को तुला राशि में प्रवेश करेगा और कुल मिलाकर यह शनि आपको अच्छे परिणाम ही देगा।

यदि आप ठीक से आंकलन करेंगे तो निश्चित रूप से कुछ कमियां मिलेगी जिनको दूर करने की नितांत आवश्यकता है।यदि आप समय पर ऐसा कर पाएं तो आपके लिए अति उत्तम कार्य होगा और यदि आपने ऐसा नहीं किया तो यह आपके लिए महंगा साबित होगा। शनि 9 अक्टूबर और 12 नवंबर 2012 के मध्य अस्त रहेगा। इस समय सावधानी रखें, विशेषकर उच्चाधिकारी और उन लोगों से व्यवहार करते समय जो आपके जीवन में बहुत महत्व रखते हैं। अपने व्यवहार के प्रति सजग रहें।

धनु राशि:

शनि का बदलाव आपके जीवन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करेगा। शनि यहां आपकी राशि से सेक्सटाइल बना रहा है जिसको बहुत अच्छा माना जाता है। जब ग्रहों के मध्य सेक्सटाइल बनता है तो उस समय को जीवन के उत्तम समय में गिना जाता है।15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के दौरान शनि सीधी गति से चलेगा। यह समय बहुत महत्वपूर्ण है। आपकी कोई महत्वाकांक्षी योजना प्रारंभ हो सकती है। एक कार्पोरेट बिजनेसमैन और उद्योगपति के रूप में आप बहुत अच्छा प्रदर्शन करेंगे।

यदि कार्पोरेट से बड़े फाइनेंस की तलाश में हैं तो आपको निराश नहीं होना पड़ेगा। नौकरी की तलाश में हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी।8 फरवरी 2012 से 26 जून 2012 के मध्य का समय आपके लिए विभिन्न रूप में प्रासंगिक है। यह समय आपको चेतावनी देता है कि जो कुछ कमियां रह गई है उन्हें दूर करने की आवश्यकता है।

एक तरह से यह भगवान के द्वारा निर्मित स्थिति है जो उनमें लिप्त न होकर अपनी कमियों को दूर करने में मदद करती है। अपनी योजनाएं दोबारा बनाई जा सकती है और अपने खर्चों में कमी करनी चाहिए और स्थितियां को ठीक करना चाहिए। इस दौरान किसी संस्थान या सरकार से मदद चाह रहे हैं तो वो भी आसानी मिल जाएगी।

नौकरीपेशा लोगों की पदोन्नति या नौकरी में बदलाव हो सकता है।26 जून 201 2 को शनि डायरेक्टीव यानी मार्गी हो जाएगा और 4 अगस्त 2012 को दोबारा तुला राशि में प्रवेश कर जाएगा। यह बहुत अच्छा समय है जो आपकी प्रोफेशनल गतिविधियों को आवश्यक गति प्रदान करेगा।शनि 4 अगस्त 2012 को तुला राशि में प्रवेश करेगा और वर्ष के अंत तक इसी राशि में रहेगा।

जैसे ही यह तुला राशि में वापिस आ जाएगा तो यह अच्छे संबंध स्थापित करना प्रारम्भ कर देता है। महत्वाकांक्षी योजनाएं प्रारंभ की जा सकती हैं और पूर्व में किए गए प्रयास अब उत्साहवर्धक परिणाम देने लगेंगे।धन का अच्छा आगमन होगा और आपकी आर्थिक स्थिति काफी मजबूत होगी। विदेश की काफी यात्राएं होंगी जो बहुत ही फलदायी सिद्ध होंगी।

पारिवारिक जीवन सौहार्दपूर्ण और शांतिपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई उत्सव भी संपन्न हो सकता है। आपके सामाजिक दायरे का विस्तार होगा और आपके व्यक्तित्व में भी बढ़ोतरी होगी। शनि 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 तक अस्त रहेगा। यह समय बहुत अच्छा नहीं है।

मकर राशि:

आपकी राशि में शनि 15 नवंबर से 8 फरवरी 2012 के मध्य डायरेक्टीव यानी मार्गी रहेगा। इस समय आप अति व्यस्त रहेंगे। आपके दिमाग में नए विचार आएंगे जिन्हें आप कार्यरूप भी प्रदान करना चाहेंगे। इस संबंध में आप बाहर से किसी की मदद की उम्मीद करते हैं तो वह भी आसानी से मिल जाएगी। व्यवसाय से जु़ड़े हैं तो वहां आप बहुत अच्छा करेंगे।इस दौरान आप प्रॉपर्टी या वाहन आदि खरीदने का भी मन बना सकते हैं।

पैतृक संपत्ति को लेकर यदि कोई मामला कोर्ट कचहरी में चल रहा है तो उसका फैसला आपके पक्ष में संपन्न हो जाएगा। आपको काफी यात्राएं करना पड़ेंगी और वे लाभदायक भी रहेंगी। आर्थिक स्थिति अच्छी बनी रहेगी।8 फरवरी 2012 को शनि वक्रगति को प्राप्त होगा और वक्रगति से चलते हुए 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। फरवरी और जून के मध्य आपको बहुत अच्छे परिणाम प्राप्त नहीं होंगे।

अपनी योजना और स्कीम और आवश्यक समझौता करने में आपको अतिरिक्त सावधानी बरतने की आवश्यकता है। यदि किसी प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं तो अपने प्रयासों में गहनता लाने की पूर्ण आवश्यकता है।शनि 26 जून 2012 को डायरेक्ट हो जाएगा और 4 अगस्त 2012 को फिर से तुला राशि में प्रवेश करेगा। यह एक बहुत अच्छा पीरियड है जो आपमें पैदा हुए भय को दूर करने में मदद करेगा।कुछ नए लोगों से आपकी मुलाकात होगी जो आपकी स्कीम और प्रोजेक्ट्स में मददगार रहेंगे।

परिवार में विवाह या शिशु जन्म भी संपन्न हो सकता है।4 अगस्त 2012 को शनि तुला राशि में प्रवेश करेगा और साल के अंत तक वहीं विचरण करेगा। यह माह आपको अच्छा परिणाम प्रदान करेगा। प्रोफेशनल्स, आर्टिस्ट, उशेगपति इस समय बहुत तरी करेंगे। यदि विदेश में नौकरी या शिक्षा प्राप्त करना चाह रहे हैं तो आपका यह कार्य भी बन जाएगा।प्रॉपर्टी संबंधित लम्बित मसले आपसी सहमति से हल हो जाएंगे।

यदि सरकार या किसी वित्त संस्थान से लोन लेना चाह रहे हैं तो आपका कार्य सिद्ध होगा। आप अपनी एक अलग ही छवि बनाने में सफल रहेंगे जो आने वाले समय में मददगार सिद्ध होगी।शनि 9 अक्टूबर से 12 नवंबर 2012 के मध्य अस्त रहेगा। अधिकतर अस्त शनि इच्छित परिणाम नहीं देता। आपको इस दौरान अति सतर्क रहने की आवश्यकता है

कुंभ राशि:

अब चिंता की कोई बात नहीं अब यह आपके भाग्य भाव प्रोत्साहित करेगा और यहां अगले ढाई साल रहेगा। 15 नवंबर से 8 फरवरी के मध्य जब शनि सीधी गति से चलेगा तब यह आपके लिए अति महत्वपूर्ण रहेगा। भाग्य आपका साथ देगा। आपकी महत्वाकांक्षी योजनाएं जिनमें पहले अवरोध आ गए थे फिर से प्रारंभ हो जाएंगी।जो लोग बिजनेस, कॉर्पोरेट या अन्य गतिविधियों से जु़ड़े हैं उन्हें उत्साहवर्धक परिणाम प्राप्त होंगे। यदि विदेश में कुछ करने की योजना बना रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी।

यह पीरियड आपको अति व्यस्त रखेगा और धनागमन में भी सुधार होगा।यदि किसी प्रतियोगिता में बैठ रहे हैं तो आपको सफलता प्राप्त होगी। पदोन्नति या नौकरी में बदलाव की स्थितियां भी बन रही हैं। यदि पैतृक संपत्ति संबंधी कोई मामला कोर्ट कचहरी में विचाराधीन है तो उसका फैसला आपके पक्ष में हो जाएगा। पारिवारिक वातावरण सौहार्द्रपूर्ण रहेगा और परिवार में कोई समारोह भी संपन्न हो सकता है।

शनि 8 फरवरी को वक्री होकर 16 मई 2012 को कन्या राशि में प्रवेश करेगा। अचानक आपकी गतिविधियों में बाधा उत्पन्न हो सकती है। ऐसा प्रतीत होगा कि जो चीजें आसानी से आगे बढ़ रही थी उनमें अचानक अजीबोगरीब स्थिति या चुनौतियां आ गई हैं। वास्तविक रूप से ये बुरा फेज इंगित करती हैं।

चेतावनी के ये संकेत केवल आपको मदद करने के लिए हैं।आपको कुछ यात्राएं भी करना पड़ेंगी और ये यात्राएं आपके पक्ष में वातावरण भी निर्मित करेंगी। 16 मई से 4 अगस्त 2012 के मध्य शनि कन्या राशि में वापिस जाएगा और इस दौरान वहीं पर रहेगा। जहां तक प्रोफेशनल कार्यों का संबंध है इस पीरियड में आपको एक प्रकार की असहजता का एहसास होगा।

आर्थिक तंगी भी झेलनी पड़ सकती है।आपके चलते प्रोजेक्ट्स में अवरोध आ सकते हैं। परिजन का व्यवहार या स्वास्थ्य चिंता का विषय हो सकता है। स्टॉक मार्केट में ज्यादा निर्लिप्तता आपको नकारात्मक परिणाम ही प्रदान करेगी।

4 अगस्त 2012 को दोबारा तुला राशि में शनि आएगा। कुल मिलाकर यह बहुत अच्छा पीरियड है। स्थितियों में परिवर्तन आने लगेगा और जो समस्याएं पहले आई थीं उनके समाधान मिलने लगेंगे। परिणाम का पैटर्न उत्साहवर्धक रहेगा। धन आगमन में भी काफी वृद्धि होगी। भाग्य भी आपका साथ देगा।

मीन राशि:

15 नवंबर 2011 से शनि तुला राशि में विचरण करेगा और 8 फरवरी 2012 तक आगे ही बढ़ता रहेगा। इस दौरान शनि गोचर में आपकी राशि से अच्छा कोण नहीं बनाएगा। यह समय इंगित करता है कि अब आपको कुछ समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। आपको कुछ अच्छे अवसर प्राप्त होंगे जो आपको अत्यधिक उत्साहित करेंगे।मूर्तरूप से उनको क्रियान्वित करना आपको सहज प्रतीत होगा लेकिन वैसा होगा नहीं।

यह स्थिति एक तरफ आपको प्रेरित करेगी और आप इन चुनौतियों को सामना करने के लिए तैयार हो जाएंगे। आपको सलाह दी जाती है अपने धन या एसेट्स का उपयोग बिना जांच-परख कर न करें और अपनी बुद्धिमत्ता का अधिकतम उपयोग करें।

8 फरवरी से 4 अगस्त के मध्य आपको काफी राहत प्राप्त होगी। आपकी कुछ योजनाएं और प्रोजेक्ट्स जो पहले काफी प्रयासों के बाद ठीक नहीं चल रहे थे अब वो गति पकड़ेंगे।नई आशाएं जगेंगी और अपनी क्षमताओं पर विश्वास भी कायम होगा। कोई नई एसोसिएशन या पार्टनरशिप हो सकती है जो बहुत अच्छे परिणाम देगी। प्रोफेशनल्स, कॉर्पोरेट इच्छानुकूल परिणाम प्राप्त करने में सफल रहेंगे।

जो लोग परीक्षा, प्रतियोगिता में सम्मिलित हो रहे हैं उन्हें मनोकूल परिणाम प्राप्त होंगे। अविवाहित हैं तो विवाह होने की भी पूर्ण संभावना है। मित्र-शुभचिंतकों का पूर्ण सहयोग बना रहेगा। आपको बहुत सी यात्राएं करना पड़ेंगी जो लाभदायक सिद्ध होंगी। सामाजिक गतिविधियों में वृद्धि होगी।4 अगस्त 2012 को शनि वापिस तुला राशि में आ जाएगा और फिर वर्षपर्यंत वहीं रहेगा।

आपकी कुछ योजनाओं में आशानुकूल प्रगति होगी लेकिन कुछ जस की तस बनी रहेंगी। यह स्थिति निश्चित रूप से आपको कई बार चिंतित करेंगी। कभी-कभी आप यह सोचकर हैरान हो जाएंगे कि मैंने गलती कहां की है और जिसका उत्तर भी आपको आसानी से प्राप्त नहीं होगा।कभी-कभी जीवन में ऐसी स्थितियां भी पैदा हो जाती हैं कि अलाभकारी कार्यों को बंद कर, फलदायी योजनाओं पर ही ध्यान केंद्रित करने में भलाई है। आपके कुछ विश्वासपात्र मित्र और शुभचिंतक बिना स्वार्थ भाव के समय-समय पर आपको अपना पूर्ण सहयोग प्रदान करते रहेंगे। यात्रा करने के बहुत से अवसर आएंगे।

-----शनिदेव को प्रसन्न करने के लिए ये करें उपाय----

---- शनि दिन में शनि चालीसा का पाठ, शनि मंत्रों का जाप एवं हनुमान चालीसा का पाठ करें।

---- इस दिन पीपल के पेड़ पर सात प्रकार का अनाज चढ़ाएं और सरसों के तेल का दीपक जलाएं।

----- तिल से बने पकवान, उड़द से बने पकवान गरीबों को दान करें।

----- उड़द दाल की खिचड़ी दरिद्रनारायण को दान करें।

------- अमावस्या की रात्रि में 8 बादाम और 8 काजल की डिब्बी काले वस्त्र में बांधकर संदूक में रखें।

----- शनि यंत्र, शनि लॉकेट, काले घोड़े की नाल का छल्ला धारण करें।

----- इस दिन नीलम या कटैला रत्न धारण करें। जो फल प्रदान करता है।

----- काले रंग का श्वान इस दिन से पालें और उसकी सेवा करें।

------शनिवार का व्रत यूं तो आप वर्ष के किसी भी शनिवार के दिन शुरू कर सकते हैं। इस व्रत का पालन करने वाले को शनिवार के दिन प्रातः ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके शनिदेव की प्रतिमा की विधि सहित पूजन करनी चाहिए।

-----शनिवार के दिन शनि देव की विशेष पूजा होती है। शहर के हर छोटे बड़े शनि मंदिर में सुबह ही आपको शनि भक्त देखने को मिल जाएंगे।

---- शनि भक्तों को इस दिन शनि मंदिर में जाकर शनि देव को नीले लाजवंती का फूल, तिल, तेल, गु़ड़ अर्पण करना चाहिए। शनि देव के नाम से दीपोत्सर्ग करना चाहिए।

-----शनिवार के दिन शनिदेव की पूजा के पश्चात उनसे अपने अपराधों एवं जाने-अनजाने जो भी आपसे पाप कर्म हुआ हो उसके लिए क्षमा याचना करनी चाहिए।

-----शनि महाराज की पूजा के पश्चात राहु और केतु की पूजा भी करनी चाहिए।

-----इस दिन शनि भक्तों को पीपल में जल देना चाहिए और पीपल में सूत्र बांधकर सात बार परिक्रमा करनी चाहिए।

-----शनिवार के दिन भक्तों को शनि महाराज के नाम से व्रत रखना चाहिए।

---- शनि की शांति के लिए नीलम को तभी पहना जा सकता है।

-----शनिवार को सायंकाल पीपल वृक्ष के चारों ओर 7 बार कच्चा सूत लपेटें, इस समय शनि के किसी मंत्र का जप करते रहें। फिर पीपल के नीचे सरसों के तेल का दीपक प्रज्ज्वलित करें तथा ज्ञात अज्ञात अपराधों के लिए क्षमा मांगें।

--------शनिवार को अपने हाथ की नाप का 19 हाथ काला धागा माला बनाकर पहनें।

----शनिश्वर के भक्तों को संध्या काल में शनि मंदिर में जाकर दीप भेंट करना चाहिए और उड़द दाल में खिचड़ी बनाकर शनि महाराज को भोग लगाना चाहिए। शनिदेव का आशीर्वाद लेने के पश्चात आपको प्रसाद स्वरूप खिचड़ी खाना चाहिए।

-----सूर्यपुत्र शनिदेव की प्रसन्नता हेतु इस दिन काली चींटियों को गु़ड़ एवं आटा देना चाहिए।

-----इस दिन काले रंग का वस्त्र धारण करना चाहिए।

----श्रावण मास में शनिवार का व्रत प्रारंभ करना

पंडित दयानन्द शास्त्री

Mobile. 09024390067 & 09711060179

Read more

जन्म कुंडली का पहला घर और उसके प्रभाव

भारतीय ज्योतिष में कुंडली के पहले घर को लग्न भाव अथवा लग्न भी कहा जाता है तथा भारतीय वैदिक ज्योतिष के अनुसार इसे कुंडली के बारह घरों में सबसे महत्त्वपूर्ण घर माना जाता है। किसी भी व्यक्ति विशेष के जन्म के समय उसके जन्म स्थान पर आकाश में उदित राशि को उस व्यक्ति का लग्न माना जाता है तथा इस राशि अर्थात लग्न अथवा लग्न राशि को उस व्यक्ति की कुंडली बनाते समय पहले घर में स्थान दिया जाता है।

इसके बाद आने वाली राशियों को कुंडली में क्रमश: दूसरे, तीसरे --- बारहवें घर में स्थान दिया जाता है। उदाहरण के तौर पर यदि किसी व्यक्ति के जन्म के समय आकाशमंडल में मेष राशि का उदय हो रहा है तो मेष राशि उस व्यक्ति का लग्न कहलाएगी तथा इसे उस व्यक्ति की जन्म कुंडली के पहले घर में स्थान दिया जाएगा तथा मेष राशि के बाद आने वाली राशियों को वृष से लेकर मीन तक क्रमश: दूसरे से लेकर बारहवें घर में स्थान  दिया जाएगा।

किसी भी कुंडली में लग्न स्थान अथवा पहले घर  का महत्त्व सबसे अधिक होता है तथा कुंडली धारक के जीवन के लगभग सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में इस घर का प्रभाव पाया जाता है। कुंडली धारक के स्वभाव तथा चरित्र के बारे में जानने के लिए पहला घर विशेष महत्त्व रखता है तथा इस घर से कुंडली धारक की आयु, स्वास्थ्य, व्यवसाय, सामाजिक प्रतिष्ठा तथा अन्य कई महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों के बारे में पता चलता है। कुंडली का पहला घर शरीर के अंगों में सिर, मस्तिष्क तथा इसके आस-पास के हिस्सों को दर्शाता है तथा इस घर पर किसी भी बुरे ग्रह का प्रभाव शरीर के इन अंगों से संबंधित रोगों, चोटों अथवा परेशानियों का कारण बन सकता है।

कुंडली का पहला घर हमें पिछले जन्मों में संचित किए गए अच्छे-बुरे कर्मों तथा वर्तमान जीवन में इन कर्मों के कारण मिलने वाले फलों के बारे में भी बताता है। यह घर व्यक्ति की सामाजिक प्राप्तियों तथा उसके व्यवसाय तथा जीवन में उसके अपने प्रयासों से मिलने वाली सफलताओं के बारे में भी  बताता है।

पहले घर से व्यक्ति के वैवाहिक जीवन, सुखों के भोग,  बौद्धिक स्तर, मानसिक विकास, स्वभाव की कोमलता अथवा कठोरता तथा अन्य बहुत सारे विषयों के बारे में भी जानकारी प्राप्त होती है। पहला घर व्यक्ति के स्वाभिमान तथा अहंकार की सीमा भी दर्शाता है।

कुंडली के पहले घर पर एक या एक से अधिक बुरे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक के जीवन के लगभग किसी भी क्षेत्र में समस्या का कारण बन सकता है तथा कुंडली के पहले घर पर एक या एक से अधिक अच्छे ग्रहों का प्रभाव कुंडली धारक के जीवन के किसी भी क्षेत्र में बड़ी सफलताओं, उपलब्धियों तथा खुशियों का कारण बन सकता है। इस लिए किसी भी व्यक्ति की कुंडली देखते समय उसकी कुंडली के पहले घर तथा उससे जुड़े समस्त तथ्यों पर बहुत ही ध्यानपूर्वक विचार करना चाहिए।

पंडित दयानन्द शास्त्री

Mobile--09024390067 & 09711060179

Read more

Powerd by Bloogie