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मेरी मुलाकात हाल ही में एक एलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार से हुई। ईमानदार पत्रकार ने मीडिया कुछ कर गुजरने के लिये ज्वाइन किया था लेकिन कम्पनी के अधिकार दूसरी कम्पनी को बेच दिया जाने के बाद चैनल में घोर अव्यव्स्था फैल गई। यहां नाम लेना जरूरी नहीं है कि वो कौन सा चैनल है। जरूरी है यह बताना जो उस पत्रकार ने बयान किया।

 पत्रकार ने बताया कि जब वो कवरेज करने जाते थे तो एक कम प्रसार (लघु) वाले अखबार के ब्योरो चीफ को प्रेस कॉंफ्रेंस के बाद दिये जाने वाले भोज और गिफ्ट परम्परा में खाने की लाइन में लगे और गिफ्ट के लिये ललचाते देखते।

उन्हे बहुत गुस्सा आता कि आखिर ये पत्रकारिता क्यों कर रहे हैं कहीं कमीशन एजेंट काम क्यों नहीं कर लेते।

लेकिन हकीकत जब सामने आई तो बहुत दहला देने वाली थी। ये ब्योरो चीफ 1500 रूपये मासिक पर रखे गये थे वो वेतन भी 3 महीने से नहीं मिला था। घर में बच्चे परिवार सब..... मुझे नहीं लगता कि अब आगे कुछ कहने की जरूरत है।

आखिर रीजनल मीडिया दुर्दशा का शिकार है। एक और उदाहरण देना चाहती हूं फेसबुक पर एक सीनिइयर रिपोर्टर ने शेयर किया, “सुबह होते ही एडिटर ने एसाइनमेंट पकड़ाया जाओ शुगर मिल में हो रही हड़ताल को कवर करो और वेतन के लिये भूख हड़ताल कर रहे मजदूरों पर शाम तक एक ऐसी मार्मिक स्टोरी लिखो जो लोगों को हिला कर रख दे।“ रिपोर्टर चल दिये और अपना काम पूरा किया। शाम को घर लौटते हुए सुबह पत्नी का दिया पर्चा याद आ गया। उसमे लिखे काम को पूरा करने के लिये उनके पास पैसे नहीं थे। पर्चे में बच्चों की स्कूल नोटबुक, घर के लिये राशन और बीमार मां की दवाइयां थी। दवाइयों के अलावा वो कुछ नहीं खरीद सके क्योंकि उनका अपना वेतन खुद 3 महीनों से नहीं मिला था।

ये दोनो घटनाएं कहानी नहीं है भारतीय मीडिया की कड़वी हकीकत हैं। ये समस्याये अगर आपको किसी और प्रोफेशन में आती हैं तो आप उसे छोड़ कर दूसरा तीसरा प्रोफेशन अपना सकते हैं। क्योंकि वहां आपका लक्ष्य यानि परिवार का “भरण पोषण” पूरा हो ही जायेगा। लेकिन पत्रकारिता को अपनाने वाले जूनूनी लोगों को कहां चैन मिलेगा......!

 

क्रमश:......

यह सही है कि लफ्जों में इतनी ताकत होती है कि किसी पुरानी डायरी के पन्नों पर कुछ समय पहले चली हुई कलम आज कोई तूफान लाने की क्षमता रखती है लेकिन किसी डायरी के खाली पन्ने भी आँधियाँ ला सकते हैं ऐसा शायद पहली बार हो रहा है।

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के 2017 के वो कैलेंडर और डायरी आज देश भर में चर्चा में हैं जिनके बारे में तो अधिकतर भारतीयों को शायद इससे पहले पता भी न हो। 

कारण है गाँधी जी की जगह मोदी की तस्वीर।

पूरा देश गाँधी प्रेम में उबल रहा है कि गाँधी की जगह कोई नहीं ले सकता,केवल चरखे के पीछे बैठकर फोटो खिंचाने से कोई गाँधी नहीं बन सकता आदि आदि।

सही भी है आखिर गाँधी जी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और पूरा देश उनसे बहुत प्यार करता है और उनकी इज्जत करता है।

लेकिन गाँधी जी को सही मायनों में हममें से कितनों ने समझा है?

गाँधी जी कहते थे कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है।

आज जो लोग गाँधी जी के नाम को रो रहे हैं इनमें से कितनों ने अपने भय या असुरक्षा की भावना पर विजय हासिल की है?

यह असुरक्षा की भावना नहीं तो क्या है कि एक तरफ आप चिल्ला रहे हैं कि गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता और दूसरी तरफ इसे बेमतलब मुद्दा भी बना रहे हैं! क्योंकि आप केवल इन शब्दों को 'कह' रहे हैं, इनके सहारे जनमानस को बहकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। अगर आप अपने कहे शब्दों को 'समझते' तो इस बात को मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि यह तो अटल सत्य है ही कि गाँधी जी की जगह कोई नहीं ले सकता।

गाँधी जी ही हमारे गाँधी हैं और रहेंगे ।

लेकिन जो असली भावना आपको डरा रही है वो यह है कि आप ही की गलतियों के कारण आज मोदी भी उस मुकाम पर पँहुच गए हैं कि कोई उनकी जगह भी नहीं ले सकता।विपक्ष तो क्या सरकार या फिर खुद उनकी ही पार्टी में भी उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है कम से कम आज तो नहीं।

गाँधी जी को आज जो रो रहे हैं और कह रहे हैं कि गाँधी को खादी से और खादी को गाँधी से कोई अलग नहीं कर सकता उन्होंने इतने साल गाँधी के लिए या फिर खादी के लिए क्या किया।

दरअसल वो गाँधी को नहीं उस नाम को रो रहे हैं जिस नाम को उन्होंने अपने कापी राइट से अधिक कभी कुछ नहीं समझा।

इतने सालों गाँधी जी के लिए कुछ किया गया तो यह कि देश भर में लगभग 64 सरकारी स्कीमें उनके नाम पर खोली गईं , 24 खेलों के टूर्नामेंट और ट्रोफी उनके नाम पर रखे गये,15 स्कालरशिप उनके नाम पर दी गई,

19 स्टेडियम उनके नाम पर खोले गए,39 अस्पतालों का नाम उनके नाम पर रखा गया,74 बिल्डिंग और सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे गए,5 एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा गया आदि आदि लिस्ट बहुत लम्बी है।

इसके अलावा 2 अक्तूबर को बापू की समाधि पर फूल चढ़ाकर उनके प्रिय भजनों का आयोजन और दूरदर्शन पर 'गाँधी' फ़िल्म का प्रसारण। बस कर लिया बापू को याद!

क्या यहीं तक सीमित है हमारा 'बापू प्रेम '?

हमारे राष्ट्र पिता के प्रति इतनी ही है हमारी भक्ति ?

यही सच्ची श्रद्धा है जिसके हकदार हैं हमारे बापू ?

तो फिर वो क्या है जब देश का प्रधानमंत्री जिसके नाम के साथ गाँधी तो नहीं लगा लेकिन आजादी के 70 साल बाद जब देश की बागडोर अपने हाथों में लेता है तो गाँधी जी के सपने को यथार्थ में बदलने के उद्देश्य से 'स्वच्छ भारत ' अभियान की शुरुआत करता है और उसका प्रतीक चिह्न गाँधी जी के चश्मे को रखता है?

वो क्या है जब यही प्रधानमंत्री गाँधी जी की 150 वीं जयन्ति के अवसर पर 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का बीड़ा उठाता है?

यहाँ इस प्रश्न पर तो बात ही नहीं की जा रही कि इतने सालों जिस 'गाँधीवादी' पार्टी का शासन था उसने इस दिशा में क्या कदम उठाए या फिर आजादी के इतने सालों बाद भी किसी  प्रधानमंत्री को इस मूलभूत स्तर पर काम क्यों करना पड़ रहा है।वो क्या है जब प्रधानमंत्री 'मन की बात ' में देशवासियों से 'गाँधी की खादी' अपनाने का आह्वान करते हैं तो खादी की बिक्री में 125% की बढोत्तरी दर्ज होती है (इंडिया टुडे की रिपोर्ट) ।

वो क्या है जब मोदी नारा देते हैं  "खादी फार नेशन , खादी फार फैशन " ?

वो क्या है जब प्रधानमंत्री खादी के उन्नयन के लिए पंजाब में 500 महिलाओं को चरखा बाँटने वाले आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं?

गाँधी जी अपने बाथरूम की सफाई खुद ही करते थे तो आज जो गाँधी के नाम पर विलाप कर रहे हैं उनमें से कितने उनका अनुसरण करते हैं?

और वो क्या है जब इस देश का प्रधानमंत्री उनका अनुसरण करते हुए न सिर्फ खुद हाथ में झाड़ू पकड़ कर सफाई अभियान की शुरुआत करते हैं बल्कि पूरे देश को प्रेरित करते हैं?

लेकिन यह अजीब सी बात है कि जब प्रधानमंत्री के हाथों में झाड़ू होता है तो कोई सवाल नहीं करता लेकिन उन्हीं हाथों में चरखा आ जाता है तो मुद्दा बन जाता है?

आपको इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता कि खादी की बिक्री जो कि कांग्रेस के शासन काल के 50 सालों में 2 से 7% थी   पिछले दो वर्षों में बढ़कर 34% तक पहुँच गई।

आपको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले भी 6 बार जब बापू इस कैलेंडर में नहीं थे वो भी आप ही के शासन काल में 

1996,2002,2005,2011,2012,2013, में तब आपने इसे मुद्दा नहीं बनाया था तो आपके लिए गाँधी जी की ही प्रिय प्रार्थना 'आप सबको सम्मति दे भगवान ' 

गाँधी जी केवल चरखा और खादी तक सीमित नहीं हैं वो एक विचारधारा हैं जीवन जीने की शैली हैं नैतिकता सच्चाई दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के साथ साथ अहिंसा के प्रतीक हैं। वे व्यक्ति नहीं अपने आप में एक संस्था हैं।

इससे बड़ी बात क्या होगी कि वे केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाते हैं। जब भारत के गाँधी पर अमेरिका के जान ब्रिले  फिल्म लिखते हैं और रिचर्ड एटनबोरो निर्देशित करते हैं तो वे गाँधी को हमसे छीनते नहीं हैं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को उनके व्यक्तित्व एवं विचारधारा से अवगत कराते हैं, उनकी सीमाएं भारत को लाँघ जाती हैं। 

तो जो लोग आज कैलेंडर की तस्वीर पर बवाल मचा रहे हैं वे अपनी असुरक्षा की भावना से बाहर निकल कर समझें कि गाँधी जी इतने छोटे नहीं कि किसी तस्वीर के पीछे छिपाए जांए।

डॉ नीलम महेंद्र

 

इस्लामाबाद: जमात-उद-दावा के प्रमुख हाफिज सईद ने पाकिस्तान सरकार से कहा है कि उसका नाम उस सूची से तत्काल हटाया जाए जो देश से बाहर जाने को लेकर उस पर प्रतिबंध लगाती है। उसने दावा किया कि उससे न तो सुरक्षा को कोई खतरा है और न ही उसका संगठन आतंकवादी गतिविधियों में कभी शामिल रहा है।

वर्ष 2008 में हुए मुंबई आतंकवादी हमले के मास्टरमाइंड ने गृहमंत्री चौधरी निसार अली खान को लिखे पत्र में कहा, ‘‘38 लोगों को सूची में डालने वाले 30 जनवरी 2017 को जारी ज्ञापन पत्र को तत्काल वापस लिया जाना चाहिए।’’ मुंबई में हुए आतंकवादी हमले में 166 लोगों की मौत हो गई थी।

सरकार ने सईद एवं जमात उद दावा के 37 अन्य नेताओं और उसकी फलाह ए इंसानियत चैरिटी को पिछले महीने ‘एग्जिट कंट्रोल लिस्ट’ में डाल दिया था।

शांति एवं सुरक्षा के लिए ‘हानिकारक’ गतिविधियों में शामिल होने के संबंध में सईद और संगठन के चार अन्य नेताओं को 90 दिनों के लिए ‘नजरबंद’ कर दिया गया है। इसके अलावा गृह मंत्रालय ने जमात उद दावा और एफआईएफ को छह महीने के लिए ‘‘निगरानी-सूची’’ में डाल दिया था।

लेकिन सईद ने सरकार के निर्णय का विरोध करते हुए कहा, ‘‘जमात उद दावा संगठन पाकिस्तान में किसी आतंकवादी गतिविधि में कभी शामिल नहीं रहा और संगठन पर आतंकवाद या संपत्ति को नुकसान पहुंचाने संबंधी किसी घटना का कभी आरोप नहीं लगा।’’ उसने तर्क दिया कि संघीय या प्रांतीय सरकारों ने किसी अदालत में उसके खिलाफ कभी कोई सामग्री पेश नहीं की।

उसने वर्ष 2009 में उसके खिलाफ एक मामले में लाहौर उच्च न्यायालय की एक पूर्ण पीठ की टिप्पणी का हवाला दिया ।अदालत ने कहा था, ‘‘मौजूदा मामले में सरकार के पास इस बात का कोई सबूत नहीं है कि याचिकाकर्ता से पाकिस्तान की सुरक्षा को कोई खतरा है और केवल संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव के आधार पर किसी की स्वतंत्रता में अवरोध पैदा नहीं किया जा सकता।

वाशिंगटन: राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जानते हैं कि रूस के साथ ‘बेहतर संबंध’ अमेरिका के हित में है और इसलिए वह पूर्ववर्ती प्रशासन से इतर रूस के साथ मित्रवत संबंध चाहते हैं जबकि ओबामा प्रशासन इस तरह के प्रयास में नाकाम रहा था।

व्हाइट हाउस के प्रेस सचिव सीन स्पाइसर ने कल संवाददाताओं से कहा, ‘मुझे लगता है राष्ट्रपति की उस इच्छा में थोड़ा अंतर है कि वह यह समझते हैं कि रूस के साथ बेहतर संबंध समूची दुनिया में आईएसआईएस और आतंकवाद के खात्मे में हमारी मदद कर सकता है। ओबामा प्रशासन ने रूस के साथ संबंध सुधारने की कोशिश तो की, लेकिन वो नाकाम रहे।’स्पाइसर ने कहा, ‘उन्होंने रूस को बताने की कोशिश की कि क्रीमिया पर आक्रमण नहीं करें, लेकिन नाकाम रहे। मौजूदा राष्ट्रपति यह समझते हैं कि सहज संबंध अमेरिका के राष्ट्रीय और आर्थिक हित में है। अगर पुतिन और रूस के साथ उनके बेहतर रिश्ते हैं तो यह अच्छा है और अगर ऐसा नहीं होता है तो वह इस दिशा में आगे बढ़ेंगे।’ उन्होंने कहा कि लेकिन वह सिर्फ ये बात मानने को तैयार नहीं हैं कि अतीत में ऐसा होना संभव नहीं था।

स्पाइसर ने दृढ़ता से इस बात का खंडन किया कि ट्रम्प रूस को लेकर नरम हैं। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति ने यह स्पष्ट किया है कि उन्हें उम्मीद है कि रूस सरकार यूक्रेन में हिंसा कम करेगी और क्रीमिया को वापस लौटायेगी। उन्होंने कहा, ‘दूसरी ओर उन्हें इस बात की भी पूरी उम्मीद है और वह पूर्ववर्ती प्रशासन के विपरीत रूस के साथ बेहतर संबंध चाहते हैं ताकि आईएसआईएस और आतंकवाद जैसी दुनिया की ऐसी कई समस्याओं का मिलकर समाधान किया जा सके।’ बहरहाल, विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी के नेताओं ने रूस पर कथित रूप से नरम रवैये को लेकर ट्रम्प की आलोचना की है।

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