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विचार

हर एक चीज की शुरूआत एक सपने से होती है और सपना तब सपना नहीं रह जाता जब उसे हकीकत में बदल देने का दृढ विश्वास हो। आज से कई साल पहले एक व्यक्ति ने सपना देखा कि वह हजारों मील दूर बैठे एक व्यक्ति से वैसे ही बात करेगा जैसे वह उस व्यक्ति से सामने बैठ कर बात कर रहा हो। ऐसे ही किसी ने सपना देखा कि एक दिन आसमान में आराम से उड़ेगा, ये सभी सपने थे। इन सपनों को जब उन्होंने अपने आस-पास के लोगो को बताया, तो लोगों ने उनका मजाक उड़ाया, लेकिन वो गलत नहीं थे, उन्होंने खुद को साबित किया। एक ने टेलीफोन का अविष्कार किया तो दूसरे ने हवाई जहाज का।

लीड इंडिया ने भी एक सपना देखा है लेकिन सपने की बात बाद में पहले हकीकत की। जब हमने गाँवों से भी बदतर रोड के हालात देखे, जहाँ बुलेट ट्रेन की बात हो रही हो वहां एक किलोमीटर का सफ़र तय करने में धूल फांकते हुए घंटों लग जाएँ, जहाँ चमचमाती रोशनी के बीच हजारों घर अँधेरे में डूबे रहने को मजबूर हैं, जहाँ पीने के लिए पानी नहीं है, जहाँ बच्चों बुजुर्गों के लिए कोई पार्क नहीं है, जहाँ कोई सरकारी अस्पताल नहीं, जहाँ गरीब की कोई आवाज़ नहीं, अगर है तो सिर्फ मनमानी और अव्यवस्था। क्या ऐसी भयंकर स्थिती देश के किसी कोने में है या किसी नेक्स्लाईट एरिया में जहाँ आज भी बुनियादी सुविधाएँ नहीं पहुंच पायी हैं।

नहीं, ऐसी स्थिति देश की राजधानी दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र की है। ऐसा नहीं है कि केवल बुराड़ी क्षेत्र ही पिछड़ा हुआ है बल्कि दिल्ली में कई ऐसे क्षेत्र है जहाँ रहने वालों की दशा बहुत दयनीय है। परन्तु यहाँ का निवासी होने की वजह से बुराड़ी क्षेत्र से ज्यादा परिचित हूँ। कुछ महीनो पहले जब लीड इंडिया की टीम ने बुराड़ी क्षेत्र का सर्वे किया तो कई ऐसे बुजुर्ग और महिलाएं मिली जो गंभीर बीमारी के शिकार है, उनके घरों के ऊपर से हाई वोल्टेज बिजली के तार गुजर रहे है लेकिन उनके घरों में बिजली नहीं है, बच्चे पढ़ नहीं पाते, महिलाएं काम नहीं कर पातीं क्योंकि बिजली विभाग की मनमानी है और उनकी आवाज़ उठाने का कोई माध्यम नहीं है।

हमारे सर्वे में स्कूल जाने वाली कई बच्चियों और महिलाओं ने कहा इस क्षेत्र की मुख्य सड़कें शाम के वक़्त अँधेरे में डूब जाती क्योंकि सड़कों पर लाईट की व्यवस्था नहीं है जिससे उन्हें शाम के वक्त घर से बाहर जाने में असुरक्षा महसूस होती है। आखिर इस चीज की शिकायत किससे करें, जनप्रतिनिधि बिजली विभाग पर टाल देते हैं, थाना कुछ कर नहीं सकता, इसलिये कोई और रास्ता है नहीं, है सिवाय चुप रहने के। तब खटकता है काश कोई अखबार होता जो इन मुद्दों को उठाता। 

हमें ऐसे कई मुद्दे मिले जहाँ आम आदमी या तो घुट घुट कर संघर्ष कर रहा है या अपनी हार मानकर खामोश है। इसलिये लीड इंडिया टीम ने अपने संरक्षक व मार्गदर्शक डॉ एपीजे अब्दुल कलाम को साक्षी मानकर अपने वीकली एडिशन की शुरुआत बुराड़ी विधान सभा से करने का निश्चय किया है ताकि अब किसी की आवाज़ इस क्षेत्र में न दबे, ताकि इस क्षेत्र में भ्रष्टाचार या मनमानी को रेड कारपेट के नीचे न दबाया जा सके, ताकि आम आदमी के लिए आये हक के पैसे व अवसर को किसी खास को ना पहुंचाया जा सके।

क्योंकि अब लीड इंडिया जरुर बोलेगा और डंके की चोट पर बोलेगा। इसलिए हम कहते है देश दुनिया की खबरें बाद में पहले आप हमारी प्राथमिकता होंगे।

परन्तु कुछ वास्तविकता से भी आपको रूबरू करना जरुरी है। अखबार सशक्त रूप से चले और हमेशा निष्पक्ष रहे, किसी के साथ सांठगांठ न करे, किसी के रहमो करम पर आश्रित ना हो, अखबार सच को सामने लाने से डरे नहीं और किसी भी बाहुबल के आगे झुके नहीं, तभी जाकर ऐसा अखबार आपकी सशक्त आवाज़ बन सकता है और उसमें आपकी सहभागिता बहुत जरूरी है।

परंतु यह होगा कैसे? किसी भी अखबार का मुख्य आय का स्रोत विज्ञापन होता है लेकिन लीड इंडिया ने विज्ञापन की परवाह किये बगैर एक ऐसी जगह से इस एडिशन की शुरूआत की है जो इंडस्ट्रियल एरिया नहीं है। जहाँ विज्ञापन मिलने की कम सम्भावना है। इसलिए इस अखबार को भगवान भरोसे न छोड़ें बल्कि इसे अपना अखबार समझें, अपनी आवाज़ समझे जो किसी के आगे झुके नहीं, दबे नहीं। यदि इस अखबार का आप ज्यादा से ज्यादा वार्षिक सब्सक्रिप्शन करें अथवा खरीद कर पढ़ें तो अखबार की निर्भरता विज्ञापन पर कम होगी। आप से यह भी आग्रह है कि आप हमारी गलतियों के लिये आलोचना करें, अच्छाई के लिये प्रशंसा भी अवश्य करें। 

अंत में आपसे कहना चाहूँगा कि लीड इंडिया की टीम ने यह सपना देखा है कि बुराड़ी का यह लीड इंडिया एडिशन केवल अखबार ना हो बल्कि बुराड़ी के लिए एक विजन हो जिसका मकसद बुराड़ी को श्रेष्ठ विधानसभा में तब्दील करना है, वैसे ही जैसे किसी के प्रयास से कोइ गाँव अत्यंत आधुनिक बन जाता है, और किसी मैट्रिक पास अन्ना की वजह से कोइ गाँव रालेगण सिद्धी बन जाता है। 

“लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” (लीपा) के अध्यक्ष सुभाष सिंह ने मीडिया की विश्वसनीयत पर हो रहे हमलों की घोर निन्दा करते हुए कहा है कि मीडिया की छवि को ध्वस्त करने का काम बड़े सुनियोजित तरीके से किया जा रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया, क्षेत्रिय मीडिया, टीवी मीडिया एवं वेब मीडिया से इन सुनियोजित हमलों के खिलाफ एकजुट होने की अपील की।

 उन्होंने कहा कि भारत में मीडिया को निशाना बनाने का एक नया चलन शुरू हुआ है। मीडिया पर सीधा प्रहार किया जा रहा है। पत्रकार का काम है जनता के लिये सवाल पूछना। सवालों से बचने के लिये पत्रकारिता को खरीदने और उसके मुंह पर लगाम लगाने के प्रयास नई बात नहीं है। लेकिन वर्तमान में यह नया प्रयोग हो रहा है। मीडिया की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह लगाने का प्रयोग।

 हाल ही में आसाराम की प्रवक्ता नीलम दुबे ने टीवी पत्रकार दीपक चौरसिया को दलाल पत्रकार कह दिया और एक कार्यक्रम के दौरान भाजपा के नेता कैलाश विजयवर्गीय ने संयम खोते हुए टाइम्स नाऊ के टीवी एंकर व एडिटर इन चीफ अर्णब गोस्वामी को पत्रकारिता की हैसियत समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि तुम्हारी हैसियत नहीं कि मेरे पांच वोट भी काट सको। ये मीडिया की छवि पर सीधा हमला है।

 कुछ लोगों की रणनीति है कि जब मीडिया कोई मामला उठाये तो उसे गम्भीरता से लिया ही ना जाये। कॉर्पोरेट और पॉलीटिशियन वर्ग के कुछ लोग चाहते हैं कि जनता का विश्वास मीडिया से उठ जाये। क्योंकि मीडिया ही ऐसा माध्यम है जहां जनता की आवाज को बल मिलता है।

 मीडिया घोटालों को उजागर करने का काम शुरू से ही करता आ रहा है बीते कुछ समय से मीडिया ने भ्रष्टाचार के खिलाफ काफी मुखर प्रतिक्रिया दी है। 2जी, कोयला, कॉमनवेल्थ जैसे जल,थल और नभ में हुए बड़े घोटाले मीडिया की बदौलत ही उजागर हुये।

 श्री सिंह ने कहा कि सोशल मीडिया पर भी अभिव्यक्ति के नाम पर पत्रकारों को दलाल साबित करने की कोशिश की जा रही है। दीपक चौरसिया हों या अर्णब गोस्वामी हर पत्रकार की अलग-अलग शैली होती है जिसमें वो जनता के लिये सवाल पूछता है उसका मकसद अपने हित को साधना नहीं होता।

 श्री सुभाष सिंह ने कहा कि कभी राजदीप सरदेसाई, कभी आशुतोष, कभी ओम थानवी के खिलाफ सीधे अभद्र शब्दों का प्रयोग किया जाता है कभी पत्रकारों पर जानलेवा हमले होते हैं। उत्तर प्रदेश में हाल ही में कल्पतरू अखबार के पत्रकार पर जानलेवा हमला हुआ।

 17 जुलाई को मध्य प्रदेश के उमेरिया में माईनिंग माफिया के खिलाफ लगातार खबर छापने के लिये पत्रकार चन्द्रिका राय की उनके परिवार समेत हत्या कर दी गई। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया, क्षेत्रिय मीडिया, टीवी मीडिया से इन हमलों के खिलाफ एक मंच पर आने का आह्वान किया।

 सुभाष सिंह ने कहा कि सरकार से मांग करते हुए कहा कि “लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन” चाहती है कि सरकार मीडिया कर्मियों की सुरक्षा के लिये कड़े कानून बनाये। अगर कोई भी मीडिया को उसका उत्तरदायित्व को निभाने से रोकता है या उसे कमजोर करने का प्रयास करता है तो उनके खिलाफ इस तरह कार्यवाई के प्रावधान होने चाहिये जैसे आईपीसी में सरकारी कामकाज में बाधा उत्पन्न करने वालो के खिलाफ होता है।

 श्री सुभाष सिंह ‘लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं। ’लीड इंडिया पब्लिशर्स एसोसिएशन’ (लीपा) मीडिया के हित में काम करने वाली ऐसी संस्था है जो अपनी विश्वसनीयता के लिए प्रसिद्ध है। देश भर के 2200 मीडिया संस्थान सदस्य के रूप में जुड़े है। यह संस्था मूलतः क्षेत्रीय अखबारों का प्रतिनिधित्व करती है।

मेरी मुलाकात हाल ही में एक एलैक्ट्रॉनिक मीडिया के पत्रकार से हुई। ईमानदार पत्रकार ने मीडिया कुछ कर गुजरने के लिये ज्वाइन किया था लेकिन कम्पनी के अधिकार दूसरी कम्पनी को बेच दिया जाने के बाद चैनल में घोर अव्यव्स्था फैल गई। यहां नाम लेना जरूरी नहीं है कि वो कौन सा चैनल है। जरूरी है यह बताना जो उस पत्रकार ने बयान किया।

 पत्रकार ने बताया कि जब वो कवरेज करने जाते थे तो एक कम प्रसार (लघु) वाले अखबार के ब्योरो चीफ को प्रेस कॉंफ्रेंस के बाद दिये जाने वाले भोज और गिफ्ट परम्परा में खाने की लाइन में लगे और गिफ्ट के लिये ललचाते देखते।

उन्हे बहुत गुस्सा आता कि आखिर ये पत्रकारिता क्यों कर रहे हैं कहीं कमीशन एजेंट काम क्यों नहीं कर लेते।

लेकिन हकीकत जब सामने आई तो बहुत दहला देने वाली थी। ये ब्योरो चीफ 1500 रूपये मासिक पर रखे गये थे वो वेतन भी 3 महीने से नहीं मिला था। घर में बच्चे परिवार सब..... मुझे नहीं लगता कि अब आगे कुछ कहने की जरूरत है।

आखिर रीजनल मीडिया दुर्दशा का शिकार है। एक और उदाहरण देना चाहती हूं फेसबुक पर एक सीनिइयर रिपोर्टर ने शेयर किया, “सुबह होते ही एडिटर ने एसाइनमेंट पकड़ाया जाओ शुगर मिल में हो रही हड़ताल को कवर करो और वेतन के लिये भूख हड़ताल कर रहे मजदूरों पर शाम तक एक ऐसी मार्मिक स्टोरी लिखो जो लोगों को हिला कर रख दे।“ रिपोर्टर चल दिये और अपना काम पूरा किया। शाम को घर लौटते हुए सुबह पत्नी का दिया पर्चा याद आ गया। उसमे लिखे काम को पूरा करने के लिये उनके पास पैसे नहीं थे। पर्चे में बच्चों की स्कूल नोटबुक, घर के लिये राशन और बीमार मां की दवाइयां थी। दवाइयों के अलावा वो कुछ नहीं खरीद सके क्योंकि उनका अपना वेतन खुद 3 महीनों से नहीं मिला था।

ये दोनो घटनाएं कहानी नहीं है भारतीय मीडिया की कड़वी हकीकत हैं। ये समस्याये अगर आपको किसी और प्रोफेशन में आती हैं तो आप उसे छोड़ कर दूसरा तीसरा प्रोफेशन अपना सकते हैं। क्योंकि वहां आपका लक्ष्य यानि परिवार का “भरण पोषण” पूरा हो ही जायेगा। लेकिन पत्रकारिता को अपनाने वाले जूनूनी लोगों को कहां चैन मिलेगा......!

 

क्रमश:......

यह सही है कि लफ्जों में इतनी ताकत होती है कि किसी पुरानी डायरी के पन्नों पर कुछ समय पहले चली हुई कलम आज कोई तूफान लाने की क्षमता रखती है लेकिन किसी डायरी के खाली पन्ने भी आँधियाँ ला सकते हैं ऐसा शायद पहली बार हो रहा है।

खादी एवं ग्रामोद्योग आयोग के 2017 के वो कैलेंडर और डायरी आज देश भर में चर्चा में हैं जिनके बारे में तो अधिकतर भारतीयों को शायद इससे पहले पता भी न हो। 

कारण है गाँधी जी की जगह मोदी की तस्वीर।

पूरा देश गाँधी प्रेम में उबल रहा है कि गाँधी की जगह कोई नहीं ले सकता,केवल चरखे के पीछे बैठकर फोटो खिंचाने से कोई गाँधी नहीं बन सकता आदि आदि।

सही भी है आखिर गाँधी जी इस देश के राष्ट्रपिता हैं और पूरा देश उनसे बहुत प्यार करता है और उनकी इज्जत करता है।

लेकिन गाँधी जी को सही मायनों में हममें से कितनों ने समझा है?

गाँधी जी कहते थे कि सबसे महत्वपूर्ण लड़ाई भय और असुरक्षा जैसे तत्वों पर विजय पाना है।

आज जो लोग गाँधी जी के नाम को रो रहे हैं इनमें से कितनों ने अपने भय या असुरक्षा की भावना पर विजय हासिल की है?

यह असुरक्षा की भावना नहीं तो क्या है कि एक तरफ आप चिल्ला रहे हैं कि गांधी की जगह कोई नहीं ले सकता और दूसरी तरफ इसे बेमतलब मुद्दा भी बना रहे हैं! क्योंकि आप केवल इन शब्दों को 'कह' रहे हैं, इनके सहारे जनमानस को बहकाने की असफल कोशिश कर रहे हैं। अगर आप अपने कहे शब्दों को 'समझते' तो इस बात को मुद्दा नहीं बनाते क्योंकि यह तो अटल सत्य है ही कि गाँधी जी की जगह कोई नहीं ले सकता।

गाँधी जी ही हमारे गाँधी हैं और रहेंगे ।

लेकिन जो असली भावना आपको डरा रही है वो यह है कि आप ही की गलतियों के कारण आज मोदी भी उस मुकाम पर पँहुच गए हैं कि कोई उनकी जगह भी नहीं ले सकता।विपक्ष तो क्या सरकार या फिर खुद उनकी ही पार्टी में भी उनकी जगह लेने वाला कोई नहीं है कम से कम आज तो नहीं।

गाँधी जी को आज जो रो रहे हैं और कह रहे हैं कि गाँधी को खादी से और खादी को गाँधी से कोई अलग नहीं कर सकता उन्होंने इतने साल गाँधी के लिए या फिर खादी के लिए क्या किया।

दरअसल वो गाँधी को नहीं उस नाम को रो रहे हैं जिस नाम को उन्होंने अपने कापी राइट से अधिक कभी कुछ नहीं समझा।

इतने सालों गाँधी जी के लिए कुछ किया गया तो यह कि देश भर में लगभग 64 सरकारी स्कीमें उनके नाम पर खोली गईं , 24 खेलों के टूर्नामेंट और ट्रोफी उनके नाम पर रखे गये,15 स्कालरशिप उनके नाम पर दी गई,

19 स्टेडियम उनके नाम पर खोले गए,39 अस्पतालों का नाम उनके नाम पर रखा गया,74 बिल्डिंग और सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे गए,5 एयरपोर्ट का नाम उनके नाम पर रखा गया आदि आदि लिस्ट बहुत लम्बी है।

इसके अलावा 2 अक्तूबर को बापू की समाधि पर फूल चढ़ाकर उनके प्रिय भजनों का आयोजन और दूरदर्शन पर 'गाँधी' फ़िल्म का प्रसारण। बस कर लिया बापू को याद!

क्या यहीं तक सीमित है हमारा 'बापू प्रेम '?

हमारे राष्ट्र पिता के प्रति इतनी ही है हमारी भक्ति ?

यही सच्ची श्रद्धा है जिसके हकदार हैं हमारे बापू ?

तो फिर वो क्या है जब देश का प्रधानमंत्री जिसके नाम के साथ गाँधी तो नहीं लगा लेकिन आजादी के 70 साल बाद जब देश की बागडोर अपने हाथों में लेता है तो गाँधी जी के सपने को यथार्थ में बदलने के उद्देश्य से 'स्वच्छ भारत ' अभियान की शुरुआत करता है और उसका प्रतीक चिह्न गाँधी जी के चश्मे को रखता है?

वो क्या है जब यही प्रधानमंत्री गाँधी जी की 150 वीं जयन्ति के अवसर पर 2019 तक पूरे देश को खुले में शौच से मुक्त करने का बीड़ा उठाता है?

यहाँ इस प्रश्न पर तो बात ही नहीं की जा रही कि इतने सालों जिस 'गाँधीवादी' पार्टी का शासन था उसने इस दिशा में क्या कदम उठाए या फिर आजादी के इतने सालों बाद भी किसी  प्रधानमंत्री को इस मूलभूत स्तर पर काम क्यों करना पड़ रहा है।वो क्या है जब प्रधानमंत्री 'मन की बात ' में देशवासियों से 'गाँधी की खादी' अपनाने का आह्वान करते हैं तो खादी की बिक्री में 125% की बढोत्तरी दर्ज होती है (इंडिया टुडे की रिपोर्ट) ।

वो क्या है जब मोदी नारा देते हैं  "खादी फार नेशन , खादी फार फैशन " ?

वो क्या है जब प्रधानमंत्री खादी के उन्नयन के लिए पंजाब में 500 महिलाओं को चरखा बाँटने वाले आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री बनते हैं?

गाँधी जी अपने बाथरूम की सफाई खुद ही करते थे तो आज जो गाँधी के नाम पर विलाप कर रहे हैं उनमें से कितने उनका अनुसरण करते हैं?

और वो क्या है जब इस देश का प्रधानमंत्री उनका अनुसरण करते हुए न सिर्फ खुद हाथ में झाड़ू पकड़ कर सफाई अभियान की शुरुआत करते हैं बल्कि पूरे देश को प्रेरित करते हैं?

लेकिन यह अजीब सी बात है कि जब प्रधानमंत्री के हाथों में झाड़ू होता है तो कोई सवाल नहीं करता लेकिन उन्हीं हाथों में चरखा आ जाता है तो मुद्दा बन जाता है?

आपको इस तथ्य से कोई फर्क नहीं पड़ता कि खादी की बिक्री जो कि कांग्रेस के शासन काल के 50 सालों में 2 से 7% थी   पिछले दो वर्षों में बढ़कर 34% तक पहुँच गई।

आपको इस बात से भी फर्क नहीं पड़ता कि इससे पहले भी 6 बार जब बापू इस कैलेंडर में नहीं थे वो भी आप ही के शासन काल में 

1996,2002,2005,2011,2012,2013, में तब आपने इसे मुद्दा नहीं बनाया था तो आपके लिए गाँधी जी की ही प्रिय प्रार्थना 'आप सबको सम्मति दे भगवान ' 

गाँधी जी केवल चरखा और खादी तक सीमित नहीं हैं वो एक विचारधारा हैं जीवन जीने की शैली हैं नैतिकता सच्चाई दृढ़ संकल्प और अदम्य साहस के साथ साथ अहिंसा के प्रतीक हैं। वे व्यक्ति नहीं अपने आप में एक संस्था हैं।

इससे बड़ी बात क्या होगी कि वे केवल भारत में नहीं अपितु पूरे विश्व में अहिंसा के पुजारी के रूप में पूजे जाते हैं। जब भारत के गाँधी पर अमेरिका के जान ब्रिले  फिल्म लिखते हैं और रिचर्ड एटनबोरो निर्देशित करते हैं तो वे गाँधी को हमसे छीनते नहीं हैं बल्कि सम्पूर्ण विश्व को उनके व्यक्तित्व एवं विचारधारा से अवगत कराते हैं, उनकी सीमाएं भारत को लाँघ जाती हैं। 

तो जो लोग आज कैलेंडर की तस्वीर पर बवाल मचा रहे हैं वे अपनी असुरक्षा की भावना से बाहर निकल कर समझें कि गाँधी जी इतने छोटे नहीं कि किसी तस्वीर के पीछे छिपाए जांए।

डॉ नीलम महेंद्र

 

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